Monday, January 4, 2010

केंद्र सरकार की मज़बूरी

नक्सलियों से निपटने की रणनीति में बदलाव समय की मांग हो सकती है, लेकिन यह शुभ संकेत नहीं कि पश्चिम बंगाल और झारखंड की नई सरकार का रवैया केंद्र से मेल नहीं खा रहा। नक्सलियों से चाहे जैसे निपटा जाए, लेकिन केंद्र और नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में तालमेल होना प्राथमिक आवश्यकता है। यह निराशाजनक है कि नक्सलवाद का मुकाबला करने के तमाम वायदों और तैयारियों के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों के बीच आवश्यक तालमेल कायम होता नजर नहीं आ रहा। नि:संदेह इसका लाभ नक्सली संगठन उठा रहे हैं। उन्होंने न केवल आपस में बेहतर संपर्क स्थापित कर लिए हैं, बल्कि खुद को आधुनिक हथियारों से भी लैस कर लिया है। यही कारण है कि वे पुलिस और सुरक्षा बलों पर हमले करने और जनजीवन को बाधित करने में सक्षम हो गए हैं। झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में तो वे जब चाहते हैं तब आसानी से बंद आयोजित करने में सफल हो जाते हैं। यह समझ पाना कठिन है कि जब केंद्र सरकार को उनके खिलाफ कोई सीधी कार्रवाई नहीं करनी थी तो फिर ऐसा माहौल क्यों बनाया गया कि उनसे दो-दो हाथ किए जाएंगे? यह विस्मृत नहीं किया जा सकता कि नक्सलियों के खिलाफ सैन्य बलों और यहां तक कि वायुसेना के इस्तेमाल को लेकर भी व्यापक चर्चा छिड़ी। अब यह कहा जा रहा है कि नक्सलियों को निशाना बनाने के बजाय उनकी घेरेबंदी की जाएगी और उन तक हथियारों एवं अन्य सामग्री की आपूर्ति को रोका जाएगा। यह जानना कठिन है कि इसके पहले इस पर विचार क्यों नहीं किया गया कि नक्सलियों को हथियारों की आपूर्ति रोकने की जरूरत है? पिछले कुछ वर्षो में नक्सलियों ने जैसे आधुनिक हथियार एवं विस्फोटक पदार्थ जुटा लिए हैं उससे यही प्रतीत होता है कि इसके पहले उनकी सप्लाई लाइन को बाधित करने पर विचार ही नहीं किया गया। देखना यह है कि अब ऐसा करने में सफलता मिलती है या नहीं? निश्चित रूप से केवल इतने से ही नक्सलियों के मनोबल को तोड़ना कठिन है, क्योंकि अब वे इतने अधिक दुस्साहसी हो गए हैं कि हथियारों के लिए पुलिस थानों पर भी हमला करने में संकोच नहीं कर रहे हैं। पुलिस थानों और सुरक्षा बलों के ठिकानों पर नक्सलियों के हमले यह भी बताते हैं कि किस तरह पुलिस को आवश्यक संसाधनों से लैस करने में अनावश्यक देरी की गई। यह निराशाजनक है कि इस मोर्चे पर राज्य सरकारें अभी भी तत्पर नजर नहीं आतीं। यह एक तथ्य है कि पुलिस सुधारों के मामले में राज्य सरकारों का रवैया ढुलमुल ही अधिक है। यह विचित्र है कि राज्य सरकारें पुलिस सुधारों के मामले में न तो उच्चतम न्यायालय के निर्देशों पर अमल करने के लिए आगे बढ़ रही हैं और न ही सुरक्षा विशेषज्ञों के सुझावों पर। आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में रेखांकित किए जा रहे नक्सलवाद का मुकाबला करने के मामले में सबसे अधिक निराशाजनक यह है कि केंद्र और राज्यों के बीच इस पर कोई आम सहमति कायम नहीं हो पा रही है कि नक्सलियों को सही रास्ते पर कैसे लाया जा सकता है?
साभार दैनिक जागरण

Thursday, December 31, 2009

घुट-घुट कर जी रहा कानू सान्याल

ठ्ठमधुरेश, हाथीघिसा (पश्चिम बंगाल) विचारधारा जीवन को एक दायरे में बांधती है और जीने का जोश देती है, लेकिन जब वह भटक जाती है, तो जी का जंजाल बन जाती है। झंडाबरदारों को तो दुर्दिन दिखाती ही है, विकृति बन उस समाज को भी पेरती है, जो उसके केंद्रबिंदु में होता है। कुछ ऐसा ही हुआ है नक्सलवादी विचारधारा के साथ। कम से कम कानू सान्याल को देखकर तो यही लगता है। कभी देश-समाज को बदलने का सपना देखने वाले शख्स को हर उस व्यक्ति से शिकायत है, जिससे उसने उम्मीद बांधी थी। वैचारिक रिश्ते तो साथ छोड़ गए, अंतत: खून का रिश्ता ही काम आ रहा है। भाई के खर्च पर 81 साल के कानू की जिंदगी की गाड़ी जैसे-तैसे खिंच रही है, अब कोई हाल-खबर लेने भी नहीं आता है। पश्चिम बंगाल के एक गांव की झोपड़ी में नक्सलवाद का कथा पुरुष घुट-घुटकर मर रहा है। भाई पैसा न दे, तो कानू सान्याल सांस चालू रखने वाली दवा भी न खा सकें। ठीक बगल की झोपड़ी में रोज मौत की बुलाती एक औरत, साथियों की चरम दगाबाजी की निशानी है। फिर भी दोनों को कोई मलाल नहीं; मदद की अपेक्षा भी नहीं। और ऐसे ही कई और गुणों के चलते दोनों जनता के लड़ाकों के लिए नसीहत हैं। दोनों गवाह हैं कि कैसे और क्यों कोई आंदोलन बीच रास्ते से भटक जाता है; जनता बेच दी जाती है? वाकई, कानू सान्याल और लखी होना मुश्किल है। अभी के दौर में तो असंभव। कानू दा, नाम के मोहताज नहीं हैं। मगर लखी को हाथीघिसा पहुंचकर ही जाना। वे भारत में नक्सलवादी आंदोलन के प्रारंभिक कमानदारों में एक जंगल संथाल की बेवा हैं। जंगल, नक्सलबाड़ी का लड़ाका। चारु मजूमदार, खोखोन मजूमदार, सोरेन बोस, कानू सान्याल का हमकदम। खैर, कानू दा 81 साल के हो चुके हैं। बीमार हैं। दो अखबार लेते हैं। सामने के खेत, खुला आकाश, उड़ते पंछी, चरते जानवर, चिथड़ों में लिपटे नंगे पांव स्कूल जाते नौनिहाल ..,चश्मे के पीछे से सब देखते हैं। कुछ भी तो नहीं बदला! यही उनकी घुटन है। उन्होंने इसी सबको बदलने के लिए भारतीय व्यवस्था को चुनौती दी थी। कई राज्यों की पुलिस तलाशती थी। .. और अब गुटीय लाइन पर अपने भी मिलने नहीं आते। कानू की जिंदगी बड़ी मुश्किल से गुजर रही है। प्रदीप सान्याल (भाई) के पैसे से दवा खरीदी जाती है। चूंकि कार या पेट्रोल की हैसियत नहीं है, सो चाहते हुए भी कहीं निकल नहीं पाते। कानू दा को यह बात बहुत कचोटती है कि कभी साथी रहे लोग या उनकी सरकार (पश्चिम बंगाल का माकपा राज) ने मरणासन्न अवस्था में भी उनकी सुधि नहीं ली। बुद्धदेव भट्टाचार्य (मुख्यमंत्री) सार्वजनिक सभाओं में अक्सर कहते हैं-पश्चिम बंगाल में अब कोई नक्सली नहीं रहा। एक कानू बाबू है। उनको भी हम अपने साथ करना चाहते हैं। यह मुनादी है कि कैसे नक्सल आंदोलन के किरदारों को उनके ही पुराने साथियों (माकपा) ने दबाया, कुचला? ऐसे में सहयोग की अपेक्षा बेकार है। और हम ऐसा करते भी नहीं-कानू दा बोले। झोपड़ी में रह रहे कानू सान्याल बैचलर हैं।
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तार-तार हो गया उल्फा का आधार


तार-तार हो गया उल्फा का आधार

तार-तार हो गया उल्फा का आधार
गुवाहाटी : असम को भारत से अलग करने के ख्वाब के साथ 1979 में बनाया गया यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम (उल्फा) इन दिनों उथल-पुथल भरे दौर से गुजर रहा है। अपने आधार की वजह से उल्फा ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के संरक्षण में बांग्लादेश में अपने पांव जमा लिए थे, लेकिन उसे अब वहां बने रहने में दिक्कत हो रही है। पिछले साल शेख हसीना की सरकार की स्थापना, धार्मिक कट्टरवाद और उग्रवाद के विरोध में उठाए गए कदमों और शायद इस एहसास की बदौलत कि अब भारत को और नाराज नहीं किया जा सकता, उस देश में सक्रिय उल्फा तथा दूसरे उग्रवादी संगठन हताशा में सुरक्षित पनाहगाहों की तलाश में हैं। इसलिए उल्फा प्रमुख, परेश बरुआ के चीन पहंुच जाने और बांग्लादेश में मौजूद इस संगठन के सदस्यों के म्यांमार से संरक्षण मिलने की खबरों से हैरानी नहीं होनी चाहिए। लेकिन म्यांमार में भी उन्हें हालात की प्रतिकूलता का अंदाजा होने लगा है। खबर थी कि नवंबर के पहले सप्ताह में म्यांमार आर्मी ने उल्फा के एक कैंप को घेर लिया था और वहां करीब 100 उग्रवादियों पर हमला बोल दिया था। इस पृष्ठभूमि में संगठन के दो शीर्ष नेताओं विदेश सचिव शशधर चौधरी और वित्त सचिव चित्रबन हजारिका की गिरफ्तारी महत्वूपर्ण हो जाती है। बीएसएफ के अनुसार इन दोनों ने त्रिपुरा में आत्मसमर्पण किया था। इससे महज 48 घंटे पहले उल्फा ने दावा किया था कि इन दोनों को 1 नवंबर को ढाका में उनके घरों से गिरफ्तार किया गया था। 7 नवंबर को चीफ जूडिशियल मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने के बाद जब इन दोनों को गुवाहाटी लाया गया, तो उन्होंने मीडिया को बताया कि उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया था बल्कि सादी वर्दी में कुछ लोगों ने उन्हें ढाका में उनके घरों से उठाया था और फिर उन्हें भारत को सौंप दिया था। खैर हकीकत यह है कि दोनों जेल में हैं। यही नहीं इसके कुछ दिन बाद ही उल्फा का चेयरमैन अरबिंद राजखोवा और डिप्टी कमांडर इन चीफ राजू बरुआ की गिरफ्तारी ने तो उल्फा की कमर ही तोड़ दी। उल्फा के लिए यह गठन के 30 साल में सबसे बड़ा झटका था। सवाल उठता है कि अब उल्फा क्या रुख अपनाएगा? जून 2008 से इकतरफा संघर्ष विराम करने वाले वार्ता-समर्थक धड़े के चोटी के एक उल्फा लीडर, मृणाल हजारिका के हवाले से एक अखबार ने लिखा है कि अगर राज्य को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने की हमारी मांग पर वे सहमत हो जाते हैं, तो शांति वार्ता शुरू करने का हम आधार तैयार कर सकते हैं। हम समझ चुके हैं कि असम के लिए पूर्ण प्रभुसत्ता की मांग करना व्यावहारिक नहीं है। इसलिए हम, लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए शांति वार्ता के पक्ष में हैं। ऐसे में या तो शशधर-चित्रबन की जोड़ी, शांति वार्ता की बजाए अपने क्रांतिकारी रुख पर कायम रहते हुए जेल जाना पसंद करेंगे, या वे मृणाल हजारिका गुट में शामिल हो जाएंगे और शांति प्रक्रिया को सार्थक बनाएंगे, या फिर वे अपने कानूनी और तथाकथित मानवाधिकार सलाहकारों की मदद से एक नई साजिश के लिए कोई चतुराई भरा कदम उठाएंगे। साथ ही, हो सकता है कि वार्ता-विरोधी धड़ा इन दो लोगों के पकड़े जाने का बदला लेने के लिए अपने परिचित तौर-तरीकों से मासूम स्त्री-पुरुषों और बच्चों को आतंकित करे। ऐसे किसी हमले को रोकने के लिए खुफिया विभाग को कुशलता और सतर्कता का परिचय देना होगा। परेश बरुआ के नेतृत्व वाला गुट यह साबित करने की पुरजोर कोशिश करेगा कि अभी उसमें दम है। अपने शुरूआती सालों में समाज सुधार के अपने स्वरूप से उल्फा ने एक लंबा रास्ता तय करके संगठन के खिलाफ भारतीय सेना के आपरेशन बजरंग और आपरेशन राइनो के बाद 1990 के सालों में असम छोड़कर बांग्लादेश चले जाने के बाद आईएसआई के समर्थन से उसने आतंकवादी नकाब ओढ़ लिया है। इसी प्रकार से असम के लोगों ने भी एक लंबा सफर तय किया है। अब वे उल्फा द्वारा दिखाए गए सपने से दूर होकर उसके आतंकवादी स्वरूप को पहचान चुके हैं, जो आज विदेशी ताकतों के इशारों पर खेल रहा है। (अडनी)
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Wednesday, December 30, 2009

देश को आतंकवाद से ज्यादा छलनी कर रहा नक्सलवाद


देश को आतंकवाद से ज्यादा छलनी कर रहा नक्सलवाद


नई दिल्ली : देश में मुंबई हमले के बाद आतंकवाद से निबटने के लिए अलग तंत्र और कानून बनाने के लिए जोरदार तरीके से कवायद शुरू की गई। शायद इसी कारण इस साल आतंकवाद की कोई बड़ी वारदात सामने नहीं आई। लेकिन देश में दहशत बरकरार रखने में नक्सलियों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। हालत तो यह है कि आतंकवाद पर भी नक्सलवाद भारी पड़ रहा है। सरकार माओवादियों को लेकर लेकर चाहे जो दावे कर रही हो पर वास्तविकता यह है कि वह माओवादियों पर काबू पाने में असफल रही है। नक्सली हिंसा में इस साल 31 अक्टूबर तक 742 लोग मारे जा चुके हैं। यह संख्या पिछले साल मारे गए लोगों से कहीं ज्यादा है। सरकार के आंकड़ों पर यकीन करें तो नक्सलवादी आतंकवादियों से चार गुना ज्यादा घातक सिद्घ हो रहे हैं। पिछले दिनों गृहमंत्री पी. चिदंबरम राज्यसभा में यह कह रहे थे कि किसी भी मुद्दे पर नक्सलियों से बातचीत करने को तैयार हैं तो उसी समय उनके मंत्रालय द्वारा कुछ आंकड़े सदन में पेश किए गए, जो कि काफी चौंकाने वाले हैं। एक सवाल के जवाब में गृह राज्यमंत्री अजय माकन द्वारा दिए गए इन आंकड़ों के मुताबिक इस साल 31 अक्टूबर तक नक्सल प्रभावित राज्यों में नक्सली हमलों में 742 सुरक्षाकर्मी और आम नागरिक मारे गए हैं। 2008 में यह संख्या 721 थी। पूर्वोत्तर में पिछले साल 572 आम नागरिक और सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। सुरक्षाबलों ने इस दौरान 640 नक्सलियों को मार गिराया। गृह मंत्रालय के आंकड़ों को मानें तो जम्मू कश्मीर में आतंकवाद पर अंकुश लगाने में सुरक्षा बल काफी हद तक कामयाब रहे हैं। इस साल उक्त अवधि में 123 आम नागरिक और सुरक्षाकर्मियों की जानें गईं हैं जबकि सुरक्षा बलों ने 212 आतंकियों को मार गिराया है। पिछले साल 166 आम नागरिक और सुरक्षाकर्मी मारे गए थे और 339 आतंकियों को सुरक्षा बलों ने मारा था। कई महीनों तक चुपचाप तैयारी करने के बाद आखिर केंद्र सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ अपना अब तक का सबसे बड़ा अभियान छेड़ दिया है। सूत्रों के अनुसार फिलहाल यह अभियान छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र तक सीमित रहेगा। दोनों राज्यों में सीआरपीएफ, बीएसएफ और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के 45 हजार जवान भेजे गए हैं। बाद में इससे भी ज्यादा आक्रामक और बेहतर समन्वय वाला अभियान झारखंड और उड़ीसा में छेड़ा जाएगा। छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के सबसे ज्यादा 37 हजार जवान तैनात किए जा रहे हैं। शुरुआत में 25 हजार जवान भेजे गए हैं। बाद में कश्मीर से हटाकर 12 हजार जवानों को विशेष ट्रेनिंग देकर राज्य में भेजा जाएगा। उम्मीद की जाती है कि इस सबसे बड़ी संख्या में सरकार सख्ती से निपटेगी। (अडनी)

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Monday, September 1, 2008

इस्लामी आतंकवाद का असली पैरोकार बना सिमी


राजीव कुमार

यूँ तो भारत वर्षों से आतंकवाद का दंश झेलता रहा है, लेकिन पहले यह केवल कश्मीर घाटी तक सीमित था। किन्तु समय बीतने के साथ-साथ पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने अपना ध्यान देश के अन्य शहरों में भी देना शुरू किया। पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों ने अपनी रणनीति बदलते हुए भारत के अंदर आतंकी समूह बनानी शुरू की और स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया अर्थात सिमी के रूप में उसे एक मजबूत और भरोसेमंद साथी भी मिला। आज हालात यह है कि सिमी अपने दम पर देश भर में आतंकी कार्रवाइयों को बेखौफ होकर अंजाम दे रहा है। सिमी का मानस पुत्र इंडियन मुजाहिदीन इस्लाम के नाम पर अपने कुकृत्यों को जायज ठहराता है।भारत ही नही विश्व भर में आतंकियों का एक ऐसा संगठन है, जो इस्लाम के नाम पर अन्य धर्मावलंबियों की खात्में की बात करता है। इन संगठनों के द्वारा चलाये जा रहे इस्लामिक आतंकवाद ने पूरे दुनिया में तांडव मचा रखा है। इसके आतंक से पूरी दुनिया त्राहि माम-त्राहि माम कर रही है। ये इस्लामिक आतंकवादी कुरान की कुछ आयतों का सहारा लेकर पूरी दुनिया से काफिरों को खत्म कर इस्लामिक राज्य की स्थापना करने का दु:स्वप्न देख रहे हैं। ये आतंकी अपनी आतंककारी, विध्वंसक घटनाआें को अंजाम देने में कुरान के आयतों का हवाला देकर इसे जायज ठहराने से गुरेज नही करते। वैसे आमतौर पर देखा जाता है कि इस्लाम के मानने वाले कट्टर मुसलमान कहीं भी हो वो उस देश के कानून, संविधान, राष्ट्रीय गीत को नही मानते हैं।हिन्दुस्तान में भी मुसलमानों का एक कट्टरपंथी वर्ग जो जिन्ना के मानसिकता का है, वो आतंकियों के इस इस्लामिक जेहाद का समर्थन कर रहा है। और वह पाकिस्तान के खुफिया एजेंसी आईएसआई के हांथों का खिलौना बनने को तैयार हो गया है। कश्मीर का ही उदाहरण लिया जाए तो वहां भारत सरकार ने कितना आर्थिक सहयोग किया है, कितनी सुविधाएं मुहैया कराईं हैं मगर कश्मीर के मुसलमान उस सहयोग को हवा में उड़ा देते हैं। वे सिर्फ पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने और वहां के झंडे फहराने में ही अपनी वफादारी समझते हैं। कश्मीरी मुसलमानों कीे भारत की धर्म निरपेक्षता में जरा सी भी आस्था नही है। वहां की पीडीपी, नेशनल कांग्रेस जैसी सरीखी पार्टियां भी अलगाववादियों के सुर में अपना सुर मिला रही हैं।आज विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम देने वाले आतंकियों व देश में इनका समर्थन करने वाले कट्टरपंथियों के कारण हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था खतरे में है। वैसे इस देश में लोकतंत्र तभी तक कायम रहेगा जब तक हिन्दू बहुसंख्यक है। मुसलमानों के बहुसंख्यक होने पर यह अपने धर्मनिरपेक्ष छवि को कायम नही रख पाएगा। दुरर्र्र््भाग्य से कुछ राजनीतिक पार्टियां अपने मुस्लिम परस्ती रणनीति व वोट बैंक के चलते आतंकवाद को और बढ़ाने का काम कर रही हैं। सपा के आका मुलायम सिंह खुलकर सिमी का समर्थन कर रहे हैं। अभी हाल ही में माननीय न्यायधीश श्रीमती गीता मित्तल की अध्यक्षता वाली पंचाट पीठ ने सरकार पर सिमी पर प्रतिबंध जारी रहने के पक्ष में पर्याप्त सबूत न देने का आरोप लगाते हुए सिमी पर से प्रतिबंध हटा दिया तो लालू यादव, राम विलास पासवान जैसे नेता बड़ी बेशर्मी और बेहयाई से इसका स्वागत किया।जिस राष्ट्र के नेता आतंकवाद जैसी देश को विध्वंस करने वाली घटनाओं का जिसमें हजारों बेगुनाहों की अकाल मौत हो जाती है, का भी पूरी तरह से राजनीतिकरण कर दिये हों, वहां पर आतंकवाद नासूर बनेगा ही। संभव है कि देश को रसातल में जाने में देर नही लगेगी। इतिहास साक्षी है कि यह देश अपने देश के गद्दारों के कारण ही हारा है। आज इतिहास अपने आप को एक बार फिर दुहरा रहा है। भला हो उच्चतम न्यायालय का जिसने अपने विवके का इस्तेमाल करते हुए सिमी पर प्रतिबंध जारी रखा। इस केन्द्र सरकार से पूंछा जाना चाहिए कि जो साक्ष्य व तथ्य वो अब उच्चतम न्यायालय के समक्ष रख रही है वही साक्ष्य व तथ्य उच्च न्यायालय के पंचाट के समक्ष क्यों नही रखा। पूरे देश को यह जानने का अधिकार है कि श्रीमती गीता मित्तल की अध्यक्षता वाली पंचाट पीठ ने ऐसा आरोप क्यों लगाया कि ''सरकार ने सिमी पर प्रतिबंध लगाने के पर्याप्त सबूत नही पेश किये''। मगर सच्चाई यही है कि संप्रग की सरकार ने पोटा जैसे कानून को आतंकियों के भलाई के लिए हटाया। आज आतंकवाद का बढ़ना इसी का दुष्परिणाम है।इस देश में आतंकियों का समर्थन करने वाले राजनीतिक दलों के नेताओं को इंडिया टुडे में छपे अप्रैल, 2003 के उस साक्षात्कार को जरूर पढ़ना चाहिए जिसमें सिमी के मुखिया सफदर नागौरी ने बड़े बेबाकी से कहा था कि हिन्दुस्तान को सबक सिखाने के लिए आज महमूद गजनवी की जरूरत है। मुस्लिमों के रहने के लिए यह देश तभी मुकम्मल होगा जब यहां इस्लाम का शासन होगा। इतना ही नही सिमी खुलकर अलकायदा व आजाद कश्मीर का समर्थन करता है। सिमी के आका नागौरी के नारको टेस्ट के बयान को सुनें तो पता चलता है कि अलीगढ़ में सिमी की व्यापक गतिविधियां हैं। सिमी अब सिमी के नाम से ही नही बल्किी इंडियन मुजाहिदीन के नाम से भी अपनी गतिविधियों को जारी किये हुए हैं।सिमी का संबंध अरब की राबता कमेटी के छात्र संगठन बामी और इंटरनेशनल इस्लामिक फेडरेशन ऑफ स्टूडेंट से भी है। सिमी के ही गुर्गों ने 2002 में गुप्तचर ब्यूरो के राजन शर्मा का अपहरण कर अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय के हबीब हॉल में ले जाकर बर्बरता पूर्वक वस्त्र विहीन करके पीटा था। 1997 में अलीगढ़ के सिविल लाइन क्षेत्र में सिमी का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था, जिसमें सिमी के कई प्रमुख नेता उपस्थित थे। उन दिनों नागौरी सिमी का राष्ट्रीय महासचिव था। खुफिया सूत्रों के मुताबिक वर्ष 2001 में सिमी पर प्रतिबंध लगा तो इस संगठन के दो फाड़ हो गए। एक गुट हार्ड लाइन था तो दूसरा लिबरल कोर।इतना ही नही सिमी के कार्यकर्ता आतंकवाद का प्रशिक्षण लेने पाकिस्तान-अफगानिस्तान के दौरे पर अक्सर जाते रहते हैं। गुजरात, कर्नाटक बम विस्फोट इसके ताजा उदाहरण हैं। सिमी कानपुर में भयानक दंगा करा चुका है। इसमें सिमी ने कानपुर में कुरान जलाने की झूठी अफवाह फैला दी, इससे कानपुर कई दिनों तक दंगों की आग में जलता रहा। कई बेकसूरों की बलि चढ़ी और अरबों-खरबों की संपत्ति श्वाहा हो गई। सिमी को भारत की धर्म निरपेक्षता फूटी आंखों भी नही सुहाती है। सिमी भारत को एक इस्लामिक मुल्क बनाना चाहता है। इसी के कारण उसका आदर्श अमेरिका का मोस्ट वांटेड ओसामा बिन लादेन व दुनिया में तबाही मचाने वाला तालिबान हैं।यही नही मदरसों में भी सिमी की भारी घुसपैठ है। क्योंकि यहां इस्लाम और कट्टरता की शिक्षा उसके कंटकाकीर्ण मार्ग को और सुगम बना देते हैं। इन मदरसों को चलाने के लिए सिमी को विपुल मात्रा में अरब देशों से धन मिल रहा है। कुछ अर्सों से अरब, सीरिया, ईरान का रूझान मुस्लिम कट्टरपंथी देशों की तरफ हुई है। ये मुस्लिम देश भारत में अपने पक्ष में भारी जनमत बनाना चाहते हैं।विशेषकर अमेरिका विरोधी जेहाद में क्यूबा, ईरान, सीरिया आदि देशों की संदेहास्पद भूमिका से खुफिया एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। सिमी के पक्ष में कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं का आना मुस्लिम तुष्टीकरण का भी तुष्टीकरण है। मुसलमानों का वोट हासिल करने के लिए यह गंदा खेल पूर्व में कांग्रेस खेलती थी मगर इस खेल में अब क्षेत्रीय दल भी पारंगत हो गए हैं। यहां तक कि वामदल भी मुस्लिमों को तुष्ट करने में किसी से पीछे नही है। उनके द्वारा पश्चिम बंगाल में सत्ता के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों को समर्थन देना जग जाहिर है। पिछले केरल विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों ने मुस्लिमों को रिझाने में कोई कोई कोर-कसर नही छोड़ी। राजनीतिक दलों द्वारा वोट बैंक के खातिर मुस्लिमों के प्रति पूर्ण समर्पण देश को कहीं का नही छोड़ेगी। क्योंकि जब सिमी जैसे आतंकी संगठनों की तरफदारी खुलकर राजनीति के बाजार में होने लगती है तो देश का हित चाहने वाले लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंचना स्वाभाविक है।अभी हाल ही में राजस्थान और कुछ दूसरे प्रदेशों में जेहादी घटनाओं को अंजाम देने वाले लश्कर और सिमी मोर्चे के एक संगठन ने एक घोषणा पत्र निकाला। इस घोषणा पत्र में चंद पंक्तियों को पढ़ने के बाद सब कुछ स्पष्ट हो जाता है कि वे हिन्दुओं के प्रति कितनी घृणा रखते हैं, उसके कुछ अंश इस प्रकार हैं - ''हिन्दुओं के खिलाफ जेहाद करना अल्लाह की इजाजत है। हिन्दू व कुछ अन्य हमारे विरोधी हैं। इसलिए उनके विरूध्द ज़ेहाद हमारी मजहबी अनुमति है। अगर हम लड़ते-लड़ते खत्म हो जाते हैं तो जन्नत में हमारे लिए काफी स्थान है।''इस घोषणा पत्र में और भी विष-वमन किया गया है-''हिन्दुओं को अपने 33 करोंड़ नंगे और गंदे देवताओं को मानने की गलती समझ लेना चाहिए। ये सारे हिन्दू मिलकर भी हमारे हांथों से कटती हुई गर्दनों की रक्षा नही कर पाएंगे।'* इस घोषणा पत्र में धमकी दी गई है कि ''अगर हिन्दू अपना रवैया नही बदले तो मुहम्मद गोरी और गजनवी फिर आकर इस देश में कत्लेआम करेंगे। हम यह भी दुनिया को दिखला देंगे कि इस धरती पर हिन्दुओं का खून सबसे सस्ता है।'' बाबरी ढांचा जमींदोह होने के बाद सिमी ने देश को गोरी, गजनवी द्वारा रौंदे जाने की याद दिलाई थी।एक ओर सिमी जैसे आतंकवादी संगठनों की आक्रामकता तो दूसरी ओर कांग्रेस की आतंकवाद पर लुंजपुंज, ढीली व नरम रवैया देश में विध्वंसकारी घटनाओं को बढ़ाने में भारी मदद कर रही है। इस देश को पता है कि आंध्र प्रदेश में कांग्रेस ने माओवादियों के साथ समझौता करके चुनाव जीता था। बाद में उन्हें भारी रियायतें दी गई। इसी प्रकार पूर्वोत्तर के राज्यों में उसने उल्फा के साथ गठजोड़ कर फतह हासिल किया। यह सभी को विदित है कि चुनावों में उल्फा जैसे आतंकी संगठनों की मदद से चुनाव में जीत हासिल करने के बाद उन्हें तमाम तरह के छूट व मदद करने की कांग्रेस की पुरानी चाल रही है। जम्मू-कश्मीर में तो उसकी लंबी फेहरिस्त है। वहां तो कांग्रेस आतंकियों को कबाब और बिरियानी भी खिलाती थी। उनके पकड़े जाने की स्थिति में आतंकवादियों को सुरक्षित रास्ता भी देती थी।भोले-भोले बेगुनाह नागरिकों के खून की कीमत पर वोट बैंक की राजनीति करने का काम उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश जैसे अनेंक राज्यों में होता रहता है। कांग्रेस हमेशा इस बात से भय खाती रही कि आतंकवाद को सख्ती से कुचलने पर उसका मुस्लिम वोट-बैंक बिगड़ जाएगा। इससे यही साबित होता है कि कांग्रेस ने मुसलमानों को आतंकवाद का समर्थक मान लिया है। एक प्रकार से उसने आतंकवाद को मुस्लिम वोट बैंक से जोड़कर देश के धर्म निरपेक्ष मुसलमानों के साथ घोर अन्याय का काम किया है। यही वजह है जिसके चलते संसद पर हमला करने का मुख्य आरोपी अफजल गुरू की फांसी अनिश्चित काल के लिए रोक लगा दी गई है। और तो और कांग्रेस के एक मुख्यमंत्री गुलामनवी आजाद ने यह धमकी दी कि अगर अफजल गुरू को सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार फांसी दी गई तो श्रीनगर जलकर खाक हो जाएगा। कांग्रेस ने इसके बाद बड़े बेहयाई से घुटने टेक दिये।हकीकत यह है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में आतंकवाद के मसले पर सबसे नाकाम, नपुंसक और अक्षम सरकार साबित हुई है। कांग्रेस अपने विपक्षी पार्टी को बहुत सफाई से उत्तर देती है कि कारगिल पर हमला, तीन खूंखार आतंकवादियों को कंधार छोड़ना और अक्षरधाम पर हमला क्या था। यानी कि विपक्षी पार्टियों के शासन काल में आतंकवाद की घटनाएं हुई थी इसलिए हमारे शासन काल में ये घटनाएं दुहराई जाएंगी। यह सच्चाई है कि आतंकवाद की घटनाएं राजग सरकार के समय में हुई थी। ये घटनाएं अमेरिका तक में हो गई हैं और अभी हाल में चीन के सिक्यांग प्रांत में भी हुईं है। राजनीतिक दलों को चाहिए कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति न करें। वे एकता का परिचय देते हुए आतंकवाद के नासूर को जड़ से खत्म करें। इस मुद्दे पर राजनीति की जाएगी तो देश खोखला हो जाएगा। आज एक कड़े कानून की सख्त जरूरत है, जिससे आतंकवाद पर लगाम लगाया जा सके।कांग्रेस का कहना है कि पोटा से आतंकवाद पर काबू नही पाया जा सकता। इस कानून के द्वारा किसी एक वर्ग को परेशान किया जा रहा है। मगर कांग्रेस को यह याद रखना चाहिए कि जब एक ही वर्ग आतंकवाद में लिप्त पाया जा रहा है तो क्या हमारे सुरक्षा एजेंसियों को उनसे पूंछतांछ भी करने का हक नही है। उसके लिए भी सबूत दिया जाएगा तब बात हो सकती है। इस संवेदनशील मुद्दे पर अगर कोई दल राजनीति करता है तो यही समझा जाएगा कि वो इस देश का दुश्मन है। आने वाली पीढ़ियां ऐसी राष्ट्रद्रोही पार्टियों को कभी माफ नही करेंगी। मुसलमानों को भी पोटा जैसे सख्त कानून को लागू करवाने के लिए आगे आना चाहिए। आज कोई आतंकवादी घटना होती है तो यदि कोई मुसलमान पकड़ा जाता है तो कुछ मानवाधिकार संगठन झूठ-मूठ का हो-हल्ला मचाते हैं कि बेवजह मुसलमानों को परेशान किया जा रहा है। जबकि सैकड़ों लोग जब बम विस्फोटों में मारे जाते हैं तो ये मानवाधिकार संगठन सोए रहते हैं। मानों ये मानवाधिकार संगठन न होकर दानवाधिकार संगठन हैं।अभी हाल ही में यह निर्णायक प्रमाण मिले हैं कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन तथा उसके मित्र दलों का आतंकवाद के प्रति बिल्कुल नरम रवैया है, प्रमाण यह है कि कांग्रेस पार्टी के राम नरेश यादव, बसपा के अकबर अहमद डंपी और समाजवादी पार्टी के अबू आजमी ने मुफ्ती अबू बशीर के आजमगढ़ गांव का दौरा किया था। इसके अतिरिक्त दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम सैय्यद बुखारी ने भी मुफ्ती अबू बशीर के गांव का दौरा किया था- वो बशीर जो सिमी का मास्टर माइंड है तथा जिसे अहमदाबाद के धमाकों में लिप्त पाये जाने के कारण गुजरात पुलिस ने गिरफ्तार किया था। सनद रहे कि इन धमाकों में 55 बेगुनाह लोग मारे गए थे और करीब 150 घायल हो गए थे।जहां पूरे देश में गुजरात पुलिस द्वारा मुफ्ती अबू बशीर तथा अन्य नौ लोगों की इन धमाकों तथा देश के अन्य राज्यों में धमाके में लिप्त होने पर त्वरित गिरफ्तारियां होने तथा मामले का शीघ्रताशीघ्र खुलासा करने के लिए हर जगह प्रसंशा हो रही है वहीं कांग्रेस, सपा, बसपा और कांग्रेस के नेताओं ने आतंक के इन दोषियों के विरूध्द साक्ष्य की परवाह किये बिना उनके गांव का दौरा किया। इन राजनैतिक दलों के कुत्सित इरादे तब प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देते हैं, जब वे आतंक के विरोध में की जाने वाली किसी भी ठोस कार्रवाई को किसी संप्रदाय विशेष के विरूध्द कार्रवाई बताकर उनकी निंदा करते हैं।गृहमंत्री हकीकत जानने से इंकार करते हैं और इस्लामी आतंकवादियों को गुमराह किये गए बच्चे बताते हैं। इससे बड़ा तुष्टीकरण और क्या हो सकता है। सपा, बसपा, लोजपा और कांग्रेस द्वारा आतंकवादियों के साथ हमदर्दी का प्रत्यक्ष प्रदर्शन आतंकवाद को समर्थन देने के समान है। पूरे देश की जनता को चाहिए कि आतंक का समर्थन करने वाले इन नेताओं का चुनाव के समय बहिष्कार किया जाए। वर्ना इस देश का भविष्य ही विध्वंस हो जाएगा। जनता को चाहिए कि ऐसे नेताओं का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरें। तभी आतंकवाद पर लगाम लग सकता है। क्योंकि राजनीतिक नेता जनता की सहनशीलता को उसकी कमजोरी समझ रहे हैं।

Friday, July 20, 2007


अलकायदा और ओसामाबिन लादेन ?

दुनिया में इस्लामिक आतंकवाद के जरिए आतंक मचाने वाले अलकायदा संगठन की स्थापना 1988 में हुई थी। धीरे-धीरे अलकायदा ने मुस्लिम देशों से मदद लेकर अपने संगठन को काफी मजबूत कर लिया। आज कम से कम 60 देशों में अल-कायदा की गतिविधियां जारी है। शुरू में अल-कायदा ने यहूदियों, ईसाइयों के विरूध्द खूनी जंग जारी की, लेकिन बाद में अमेरिका और ब्रिटेन समेत कई देशों सहित अलकायदा ने दुनिया के सभी गैरमुसलमानों को अपने निशाने पर ले लिया। आज हिन्दू बहुल वाला देश हिन्दुस्तान इसके निशाने पर है। लादेन ने भारत को कई बार सीडियां जारी करके को धमकाया है और उसकी सीडियों को हल्के तौर नही लेना चाहिए। क्योंकि ये इस्लामी आतंकवादी अपने मंसूबों को कामयाब करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। तो फिर हम संक्षिप्त रूप में अलकायदा गतिविधियों और ओसामा के जीवन के बारे में संपूर्ण रूप से जानकारी लेते हैं।कट्टर इस्लामिक आतंकवादी ओसामा बिन लादेन का पूरा नाम ओसामा बिन मोहम्मद बिन लादेन अवाद बिन लादेन है। लादेन का जन्म 10 मार्च 1957 को रियाद, सउदी अरबिया में हुआ था। खुद ओसामा ने 1988 में अलजजीरा टीवी चैनल के एक इंटरव्यु में उसने अपना जन्म 10 मार्च, 1957 बताया। उसके पिता मोहम्मद अबाद बिन लादेन धनी व्यापारी थे। लादेन के जन्म के बाद उसकी मां ने उसके पिता से तलाक ले लिया और मुहम्मद अल अता से विवाह कर लिया। ओसामा की शिक्षा-दीक्षा जेद्दा में हुई। वहां उसने इकोनॉमिक और मैनेजमेंट पढ़ा। 1974 में लादेन ने 17 वर्ष की उम्र में अपनी मां के भाई की लड़की नजवा घनीम से विवाह किया। लादेन ने करीब चार औरतों से शादी किया जिसमें एक को तलाक दिया। ओसामा को कुल 12 से 24 बच्चे हैं। उसकी पत्नी नजवा के अनुसार 11 बच्चे बिन लादेन के उसने खुद जने हैं।ओसामा बिन लादेन की कद-काठी बड़ी लम्बी है। एफबीआई का उसके बारे में कहना है कि वह लम्बा और पतला है। वह 6 फुट 4 ईंच या 6 फुट 6 ईंच का है। यानी लगभग 193 से 198 से.मी. है। लादेन का वजन 165 पाउंड करीब 75 केजी है। वह हमेशा सफेद पगड़ी पहनता है और सउदी लिबास में रहता है।1991 में लादेन ने सूडान को अपना अड्डा बनाया, सूडान सरकार की मदद से भारी तादाद में प्रशिक्षण शिविर बनाए। लेकिन 1996 में तालिबान के नेतृत्व में लादेन और उसके मददगार सूडान छोड़कर दोबारा अफगानिस्तान आ गए। आज भी अलकायदा के पाकिस्तान में छिपे रूप से आतंकवादी शिविर सक्रिय हैं।लादेन का अफगान मुजाहिदीनों से गहरा संबंध रहा है। सन् 1979 में जब सोवियत सेनाओं का अफगानिस्तान में पूरी तरह आधिपत्य हो गया था, तब लादेन व उसके सहयोगियों ने अमेरिका के सहयोग से मुस्लिम गुरिल्ला मुजाहिदीनों को अच्छी तरह प्रशिक्षित किया। जिससे सोवियतसंघ के अफगानिस्तान में पैर उखड़ गए। लादेन जिस संगठन का कमांडर इन चीफ था उसका पूरा नाम अल-खदमत अल कायदा था। ओसामा धनी लादेन घराने से संबंध रखता है। इसके संबंध कई इस्लामिक आतंकवादी नेताओं से है। लादेन को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए 25 मीलियन डॉलर का ईनाम अमेरिका ने रखा है, मगर आज तक वह अमेरिका के चंगुल में नही आया।लादेन अपने जीवन में दो महत्वपूर्ण फतवे जारी कर चुका है। जिसमें पहला 1996 व दूसरा1998 में। लादेन ने 1996 में यह फतवा जारी किया था कि इस दुनिया में गैर मुसलमानो को मार डालना चाहिए। दूसरा यह कि संयुक्त राष्ट्र संघ व उसके सहयोगी देशों को इजरायल से समर्थन वापस ले लेना चाहिए। साथ में यह भी कि इस्लामी देशों में भेजी गई सेना को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वापस बुला लिया जाना चाहिए।अगर उसके खूनी दास्तान को जाने तो यूएस दूतावास दारे सलाम तंजानिया, नैरोबी व केन्या के बम विस्फोटों में उसको संलिप्त माना गया। आज बिन लादेन अमेरिका का मोस्ट वांटेड क्रीमिनल है। और, अमेरिका में 11 सितंबर, 2001 की दिल दहला देने वाली घटना के सारे सबूत लादेन की ओर इशारा कर रहे थे। इसके अतिरिक्त बहुत से विमानों के अपहरण में उसका हाथ माना जाता है। न्यूयार्क सिटी न्यूयार्क के वर्ड ट्रेड सेंटर का विनाश व पेंटागन को नुकसान पहुंचाने में उसका हाथ माना गया।भारत को एक बार नही दर्जनों बार भारी तबाही व बम विस्फोटों के जरिये भारी नुकसान करने की धमकी मिल चुकी है। हॉल के दिनों की कुछ धमकियों के बारे में संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है: 8 जून, 2007 को अलकायदा ने एक सीडी जारी करके भारत में भारी खून-खराबा करने की धमकी दी। 23 मई, 2007 मुम्बई स्थित जुड़वा वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को बम से उड़ाए जाने की धमकी के बाद भारी सुरक्षा मुहैया कराया गया। 23 सितंबर, 2006 को खुफिया एजेंसी द्वारा जानकारी के बाद भाखड़ा बांध, नरेंद्र मोदी, भाजपा नेता लालकृष्ण आडवानी, अटल बिहारी वाजपेयी, कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी की सुरक्षा में भारी वृध्दि की गई। 9 दिसंबर, 2006 को संसद पर हमले के दोषी आतंकवादी अफजल गुरू की रिहाई के लिए पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों द्वारा एक विमान को अपहरण करने की धमकी मिली। जिससे एयरपोर्टो पर सुरक्षा बढ़ाई गई।अभी हॉल में जून के दूसरे सप्ताह में एक सीडी जारी किया गया जिसमें भारत को तबाह करने की धमकी मिली है। इस सीडी की व्यापक जांच चल रही है।