Sunday, April 11, 2021

मुख्यमंत्री की नाक के नीचे अधिकारियों का फर्जीवाड़ा

 बरसठी थानाध्यक्ष ने गलत रिपोर्ट दाखिल कर मुख्यमंत्री को किया गुमराह


रविन्द्र कुमार द्विवेदी की विशेष रिपोर्ट





     बरसठी, जौनपुर(उप्र)। भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाली उत्तर प्रदेश सरकार की किरकिरी उसके ही अफसर लगातार करते आ रहे हैं।  मुख्यमंत्री की नाक के नीचे कुछ भ्रष्ट अधिकारी ऐसा फर्जीवाड़ा कर रहे हैं , जिसे जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। ज्ञात हो कि ग्राम-पोस्ट परियत की वरिष्ठ  नागरिक राजकुमारी देवी पत्नी डॉ रमाकांत गुप्त ने (उम्र 73 के पार, रिटायर्ड प्रधानाध्यापिका, जूनियर हाई स्कूल) मुख्यमंत्री के जनसुनवाई पोर्टल पर एक शिकायत दर्ज कराई थी कि गांव के कुछ दबंग भू-माफिया उनके अपने ही चारदिवारी में गेट व कुछ गृह-निर्माण कार्य नहीं करने दे रहे हैं जिसके लिए वे सीविल कोर्ट का आदेश भी लाई हैं फिर भी काम शुरू होने पर दबंग हिंसक रूख अपना लेते हैं जिसके कारण अपना गृह निर्माण कार्य करवाने में असफल हो जाती हैं।  इसके लिए परियत निवासी राजकुमारी जी पुलिस वालों व बहुत उपर सीएम से लेकर पीएम तक गुहार लगाईं मगर दबंगों के हर कुत्सित कुकृत्य पर बरसठी पुलिस के आला अधिकारी पर्दा डालते रहे व उन्हें पूरी तरह संरक्षण देते रहे।

जबकि  जौनपुर सीविल कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि वादिनी श्रीमती राजकुमारी देवी अराजी 1156/0.065 की मालिक हैं व उनका नाम राजस्व व अभिलेख में दर्ज हैं, प्रतिवादीगण हस्तक्षेप कर उसे बेदखल करना चाहते हैं अत: उन्हें मना किया जाये व वादिनी राजकुमारी देवी के शांतिपूर्ण व कब्जा व दखल में विधि विरूद्ध तरीके से हस्तक्षेप न करें। वादिनी आदेश 39 नियम 3 सीपीसी का पालन अंदर 24 घंटे करें। इसके बावजूद भी बरसठी के दु:साहसी थानाध्यक्ष सीविल कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ा रहे हैं व उसकी पूरी तरह से अनदेखी कर गलत रिपोर्ट लगाकर सीएम के जनसुनवाई पोर्टल पर अभियुक्तों को पूरी तरह सहायता कर रही है व मुख्यमंत्री व उनके आला अधिकारियों को भी पूरी तरह से दिग्भ्रमित कर रहे हैं।

    सनद रहे कि राजकुमारी देवी एक वरिष्ठ नागरिक हैं और जब उन्होंने मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई तब बरसठी थानाध्यक्ष का ये कर्तव्य था कि जाकर एक बार पूछे कि कौन दबंग हैं जो आपको गृह निर्माण कार्य नहीं करने दे रहा है मगर दबंगों के साथ सांठगाठ कर थानाध्यक्ष पूरे मामले पर ही लीपापोती कर अभियुक्तों के गुनाहों पर पूरी तरह पर्दा डाल दिया है व उनके पूरी तरह से संरक्षणकर्ता बन गए हैं।

जानिये कैसे बरसठी थानाध्यक्ष व उसके अन्य कर्मचारी भू-माफियाओं से सांठगाठ कर पूरे मामले को भटकाकर सीएम कार्यालय को धोखा दे रहे हैं

     ज्ञात हो कि राजकुमारी देवी पत्नी डॉ रमाकांत गुप्त ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के जनसुनवाई पोर्टल पर 8-3-2021  प्रार्थना पत्र दिया था जिसका पंजीकरण क्रमांक 40019421012057 था, उपरोक्त प्रार्थना पत्र पर बरसठी थानाध्यक्ष  ने पूरी तरह मामले को भटकाते हुए कोई कार्यवाही नहीं कि और उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री के आफिस के आंखों में धूल झोंकते हुए किसी दूसरे गॉंव की राजकुमारी नाम की महिला का रिपोर्ट लगा दिया उस रिपोर्ट में जांचकर्ता अधिकारी एसएसआई सदानंद राय हैं व उपरोक्त रिपोर्ट पिछले साल 2020 का है जिसके कारण पूरा मुख्यमंत्री कार्यालय पूरी तरह गुमराह हो गया और बरसठी का थानाध्क्ष मुख्यमंत्री कार्यालय को धोखा देने में पूरी तरह सफल हो गया।

     बरसठी थानाध्यक्ष श्यामदास वर्मा (Shyam Das Verma) की ऐसी हरकत से ग्राम परियत की राजकुमारी देवी आश्चर्यचकित हो गईं ऐसे में एक बार फिर से  राजकुमारी देवी  ने दिनांक: 23: 03: 2021 जनसुनवाई पोर्टल पर पुन: मुख्यमंत्री को विनम्रता पूर्वक लिखकर बताया  जिसका पंजीकरण क्रमांक : 40019421015210 है कि महोदय बरसठी पुलिस ने जो रिपोर्ट लगाई है वो हमारी रिपोर्ट नहीं है फिर भी बरसठी थाना के सर पर जूं तक नहीं रेंगा और माफियाओं से सांठगांठ वाले एसओ ने  पुन: वही पुरानी रिपोर्ट दोबारा लगाकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, उनके कार्यालय व सचिव आदि को पुन: बुरी तरह से दिग्भ्रमित कर दिया। उपरोक्त पत्र में राजकुमारी देवी पत्नी डॉ रमाकांत गुप्ता ने लिखा कि श्रीमान जी वो रिपोर्ट हमारे शिकायत से पूरी तर अलग है, मात्र मेरा नाम मिलता है ।


ग्राम परियत, जिला: जौनपुर उप्र की राजकुमारी देवी का पहचान पत्र                              :                               


                                                                                                   :             बरसठी थानाध्यक्ष की फ्राड रिपोर्ट

















                  

         राजकुमारी देवी  के बारे में  उनका नाम राजकुमारी है  और पुलिस की रिपोर्ट में भी नाम राजकुमारी है किंतु शिकायतकर्ता राजकुमारी देवी के पति का नाम रमाकांत गुप्त है जबकि बरसठी पुलिस रिपोर्ट में पति का नाम: स्वर्गीय बाबुल नाथ गौतम है और राजकुमारी देवी का ग्राम परियत है तो बरसठी पुलिस की रिपोर्ट में ग्राम: पठखौली आलम गंज है जबकि राजकुमारी जी का प्रार्थना पत्र दिनांक 8-3-2021 को दिया जिसका पंजीकरण क्रमांक 40019421012057 है तो वहीं बरसठी पुलिस रिपोर्ट में पंजीकरण क्रमांक : -------------5116 है  वहीं राजकुमारी देवी पत्नी डॉ रमाकांत की पहली शिकायत दिनांक : 8-3-2021 को किया व दूसरी शिकायत दिनांक: 23: 03: 2021 को किया। बरसठी पुलिस रिपोर्ट की निस्तारण तिथि : 14/10/2020 है, जो कि पूरी तरह बहुत बड़ा फर्जीवाड़ा है।

          उपरोक्त विवरणों व प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि बरसठी पुलिस के अधिकारी जानबूझकर परियत निवासी राजकुमारी जी के प्रार्थनापत्र के बारे में मुख्यमंत्री, उनके कार्यालय व उनके सचिव आदि को दबंग भू-माफियाओं से बुरी तरह से सांठगाठ कर पूरी तरह  गुमराह किया है क्योंकि गलती एक बार हो सकती है किंतु दोबारा पुन: वहीं रिपोर्ट लगाना पूरी तरह से एक अपराध हो जाता है जो यह सिद्ध करता है कि पुलिस उपरोक्त अभियुक्तों से पूरी तरह मिलकर गंभीर अपराध कर रही है जो कि कानूनी भाषा में पूरी तरह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से की गई चार सौ बीसी है (420) है।

इस उपरोक्त मामले पर जौनपुर सीविल कोर्ट के अधिवक्ता जगदीश त्रिपाठी का कहना है कि ये सरासर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ विश्वासघात है और एक तरह का अपराध है जिसे कानून की भाषा में चार सौ बीस कहते हैं, नि:संदेह बरसठी थाना का एसओ दंडित किये जाने वाला अपराध किया है।

          जबकि सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अवधेश कुमार सिंह का उपरोक्त थानाध्यक्ष के चार सौ बीसी वाले मामले पर कहना है कि अविलंब ऐसे मामले की जांच किसी रिटायर्ड जज या किसी इंटेलिजेंस एजेंसी से करवाई जानी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि बरसठी थानाध्यक्ष ने मुख्यमंत्री के साथ ऐसा फ्राड क्यों किया और इस तरह के फ्राड करने के लिए विपक्षी से कितने रूपये खाए।

          वहीं हिंदू महासभा के अध्यक्ष पंडित बाबा नंद किशोर का कहना है कि ऐसे थानाध्यक्ष जांच को मूल विषय वस्तु से भटका देना चाहते हैं। बरसठी थानाध्यक्ष का यह कुकृत्य अक्षम्य है। पीड़ित राजकुमारी देवी व उनके पति जिनकी उम्र करीब चौहत्तर-पचहत्तर है, ऐसे नागरिकों के साथ इस तरह का बर्ताव लज्जाजनक है क्योंकि बरसठी थानाध्यक्ष श्याम दास वर्मा राजकुमारी देवी व उनके पति को मानसिक रूप से उत्पीड़ित कर रहा है, इस तहर के नीच कार्य करने वाले अधिकारी की वर्दी, बेल्ट और रिवाल्वर सरकार को छीन लेनी चाहिए। हिंदू महासभा अध्यक्ष ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश ब्रिटेन जैसे देश की तरह क्षेत्रफल वाला है और ऐसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ फ्राड करना बहुत बड़ा मामला बनता है। अगर बरसठी थानाध्यक्ष के विरूद्ध अविलंब कार्यवाही नहीं हुई तो हम बहुत बड़ा आंदोलन दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश में चलाएंगे जिसमें लखनऊ व दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस के साथ-साथ धरना-प्रदर्शन भी किया जाएगा।

 : सदाशिव तिवारी, उप्र सचिव हिन्दू एकता आंदोलन पार्टी

और, हिंदू एकता आंदोलन पार्टी के उत्तर प्रदेश सचिव सदाशिव तिवारी का उपरोक्त भ्रष्ट बरसठी थानाध्यक्ष के बारे में कहना है कि जब से ये थानाध्यक्ष आया है क्षेत्र की जनता इससे बहुत पीड़ित है, हम चाहते हैं कि अतिशीघ्र इस एसओ के विरूद्ध कठोर से कठोर कार्यवाही किया जाए वर्ना हम इस थानाध्यक्ष को हटाने के लिए प्रदेश व्यापी आंदोलन चलाने के लिए बाध्य हो जाएंगे।

     भारत वार्ता के सूत्रों से मिली समाचार के अनुसार इस दुष्ट व भ्रष्ट 420 थानाध्यक्ष से मुख्यमंत्री योगी जी के समर्थकों में भारी नाराजगी है क्योंकि वे इसे मुख्यमंत्री के प्रति किया हुआ बहुत बड़ा दु:साहसिक अपराध मानते हैं जिसके लिए अत्यंत कठोर से कठोर सजा भी कम हैं।

     वहीं, दिल्ली के कई एनजीओ उपरोक्त एसओ के कुकृत्य से दु:खी हैं व समय रहते उपरोक्त एसओ पर कार्यवाही नहीं हुई तो वो भी इसे हटाने के लिए आंदोलन तक छेड़ने को तैयार हैं।


Thursday, June 9, 2011

सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा विधेयक राष्‍ट्रविरोधी शक्तियों ने तैयार किया-डॉ0 संतोष राय

बाबा के सेना गठन का हिन्‍दू महासभा ने स्‍वागत किया

अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बाबा पंडित नंद किशोर मिश्र ने यूपीए सरकार पर हमला बोलते हुये कहा कि जिस राष्ट्र की संस्कृति का बीजमंत्र ‘‘यत्र नारियस्तु पूज्यंते तत्र रमते देवता’’ हो उस देश में आधी रात के बाद रामलीला मैदान में बाबा श्रीरामदेव जी के आमरण अनशन के समर्थन में भाग लेने वाले निद्रा निमग्न माताओं, बहनों, बालकों, वृद्धों एवं अपंगों पर पुलिस का हिंसक आक्रमण, कांग्रेस शासन द्वारा हिन्दुओं का क्रूरतम दमन एवम् लोकतंत्र की हत्या है। परंतु कांग्रेस यह भूल गयी है कि-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥
श्रीमद्भगवद्गीताए अध्याय ४

इस हिन्दू भूमि पर जब जब ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हुयी हैं तब-तब धर्म रक्षक वीरों का प्रार्दुभाव हुआ है। वीरों की जननी इस धरा पर अधर्म का नाश करने के लिये वीर शिरोमणियों की श्रृंखला अनवरत चलती रही है। हिन्दू महासभा इन्ही परम् वीर बलिदानियों की धरोहर है जो स्वातंत्र्य वीर सावरकर, अमर हुतात्मा पंडित नाथू राम गोडसे, मदन लाल ढींगरा, उधम सिंह, भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद, भाई बाल मुकंद, जैसे महान् विभूतियों की मातृ संस्था रही है। जब भी लोकतंत्र की हत्या हुयी है जनता के अधिकारों को क्रूरता पूर्वक दबाने का प्रयास हुआ है, नारी शक्ति का अपमान हुआ है, अबोध बालकों, अपंगो, वृद्धों पर प्रहार हुआ है हिन्दू महासभा ने इसका तीव्र प्रतिकार किया है।
चार जून की अर्ध रात्रि से लेकर पांच जून के प्रातःकाल तक ऐतिहासिक रामलीला मैदान में सोनिया निर्देशित भ्रष्टतम सरकार द्वारा जो क्रूरता एवं हिन्दू विरोध का नग्न ताण्डव किया गया, उसका अखिल भारत हिन्दू महासभा घोर निंदा करती है।
बाबा श्री नन्द किशोर जी ने स्वातंत्र्य वीर सावरकर द्वारा प्रतिपादित ‘‘हिन्दुओं के सैनिकीकरण तथा राजनीति के हिन्दूकरण’’ के सिद्धांत के अनुरूप बाबा श्री रामदेव जी द्वारा ग्यारह हजार सशस्त्र स्वयं सेवकों के गठन का हार्दिक स्वागत एवं हिन्दू महासभा की ओर से समर्थन किया है। गांधीवादी नपुंसकता के सिद्धांत को मानने वाले कांग्रेसी राजनीतिज्ञों द्वारा हिन्दुओं पर क्रूरतम प्रहार एवं हिन्दू संत महात्माओं के हत्या के प्रयास की हिन्दू महासभा तीव्र भर्त्सना करती है।
‘‘इन्द्रप्रस्थ के राजभवन में, जाने कैसे मंत्र चले, हार गये हैं धर्मपुत्र जब शकुनि के षड्यंत्र चले। दुर्योधनी कुचालों वाला हुआ शुरू अभियान यहां, धर्मक्षेत्र अब कुरूक्षेत्र बनेगा पूरा हिन्दुस्थान यहां।’’
जिस बाबा रामदेव के स्वागत में प्रोटोकॉल का उल्लंघन कर चार-चार मंत्रियों ने एयरपोर्ट पर उनकी अगवानी की हो जबकि दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष के आगमन पर सिर्फ एक राज्यमंत्री को स्वागत के लिये भेजा जाता है फिर अंधेरी रात में बाबा को ठग की संज्ञा प्रदान की जाती है, वे कांग्रेसी परिभाषा से अपराधी हो जाते हैं, राष्ट्रद्रोही हो जाते हैं यह संपूर्ण राष्ट्र एवं विश्व के समझ से परे है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके नेतृत्व द्वारा किया गया लोकतंत्र, मानवता एवं मानवाधिकार का हनन समस्त मर्यादाओं से परे है।
संपूर्ण राष्ट्र यह जानना चाहता है कि ऐसी क्या मजबूरी थी कि सरकार को ऐसे बर्बर एवं जघन्य कदम उठाने पड़े? इस आशय की निष्पक्ष जांच तब हो सकती है जब इस सरकार को निलंबित कर तत्काल न्यायिक जांच करायी जाये और राष्ट्र में जब तक भ्रष्टाचार मुक्त सरकार नही हो जाती है तब तक राष्ट्रपति शासन लागू किया जाये।
अखिल भारत हिन्दू महासभा स्वागत समिति के अध्यक्ष डॉ0 संतोष राय ने कहा कि सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा विधेयक का प्रारूप सांप्रदायिक एवं राष्ट्र विरोधी शक्तियों के द्वारा तैयार किया गया है। अतः यह विधेयक भारत के दुर्भाग्य का कारण बनेगा। इसका उदाहरण आपके सामने है, स्वतंत्रता से पूर्व इंग्लैन्ड की महारानी विक्टोरिया ने हम पर कम्युनल एवार्ड सौंपा था जिसे कांग्रेस एवं गांधी ने स्वीकार किया था जिसका दुष्परिणाम भारत का सांप्रदायिक विभाजन और कत्लेआम में परिणित हुआ। आज यह विधेयक कम्युनल एवार्ड का दूसरा प्रारूप है। हिन्दू महासभा घोषणा करती है कि यह विधेयक किसी भी रूप में पास नही होने देंगे। यह बिल अपने आपमें घोर हिन्दू विरोधी एवं राष्ट्र विरोधी है।
अखिल भारत हिन्दू महासभा के अंतर्राष्ट्रीय संयोजक डॉ0 राकेश रंजन ने बताया कि विश्व के 73 देशों में बाबा रामदेव के कालेधन के खिलाफ आंदोलन को अभूतपूर्व समर्थन मिला तथा संपूर्ण विश्व शिविर अमानवीय आक्रमण से आहत है।

Tuesday, February 16, 2010

दिग्विजय की वोट यात्रा

26/11 के बाद विगत शनिवार को पुणे के जर्मन बेकरी रेस्त्रा में हुए आतंकी हमले में 9 लोगों की जान चली गई और 45 घायल हो गए। मृतकों में चार विदेशी महिलाएं हैं। सन 2001 के 9/11 के आतंकी हमले के बाद अमेरिका में एक भी आतंकवादी घटना नहीं हुई। इसके विपरीत भारत में यह सिलसिला थम नहीं रहा। क्यों?

क्या हम इस तथ्य से इनकार कर सकते हैं कि पुणे की यह दुखद घटना काग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की आजमगढ़ की 'तीर्थयात्रा' के कुछ दिनों बाद घटित हुई है? इस बीच समाचारपत्रों में यह चर्चा भी थी कि युवराज राहुल गाधी भी आजमगढ़ दर्शन का कार्यक्रम बना रहे हैं।

दिल्ली के जामिया नगर स्थित बटला हाउस में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ के बाद उत्तर प्रदेश का आजमगढ़ देश की विभिन्न जाच एजेंसियों के निशाने पर है और खोजबीन से इस बात की पुष्टि भी हो चुकी है कि देश में आतंकवाद के तार आजमगढ़ से गहरे जुड़े हैं। पिछले कुछ वषरें में उत्तर प्रदेश, खासकर आजमगढ़ और पूर्वी उत्तर प्रदेश के आसपास का क्षेत्र जिहादियों का गढ़ बनता जा रहा है, जो दाऊद के गुगरें से लेकर कई आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकाने के रूप में सामने आ रहा है। किंतु बटला हाउस मुठभेड़ के बाद से ही मुस्लिम समाज के कट्टरपंथी इसे फर्जी मुठभेड़ बताकर देश की सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। मुस्लिम वोट बैंक पर गिद्ध दृष्टि रखने वाले राजनीतिक दल भी उनके साथ हैं। इस कथित मुठभेड़ के खिलाफ आजमगढ़ के कट्टरपंथियों की फौज एक पूरी ट्रेन को ही 'उलेमा एक्सप्रेस' बनाकर दिल्ली आ धमकी थी।

बटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादी आजमगढ़ के संजरपुर के निवासी थे। बाद में इस गाव से कई अन्य संदिग्धों की गिरफ्तारी भी हुई। इससे पूर्व अहमदाबाद बम धमाकों के सिलसिले में आजमगढ़ के ही एक मौलाना, अबू बशर को गिरफ्तार किया गया था। बशर की गिरफ्तारी के बाद उसके घर मातमपुर्सी के लिए सपा-बसपा और काग्रेस में होड़ लग गई थी। यह होड़ बटला हाउस मुठभेड़ के बाद और तेज हुई है। इसी सिलसिले में पिछले दिनों काग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह आजमगढ़ पहुंचे थे। वे कथित फर्जी मुठभेड़ में मारे गए युवकों के परिजनों से मिले और उसके बाद लखनऊ में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में यहा तक कहा कि 'न्याय में देरी, न्याय न देने के समान है।' जब सत्ताधारी दल राष्ट्रहितों की कीमत पर वोटबैंक की राजनीति करेगा तो स्वाभाविक है कि इससे सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल गिरेगा और राष्ट्रविरोधी शक्तियों को ताकत मिलेगी।

प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी चिदंबरम आतंकवाद के खात्मे को सरकार की बड़ी प्राथमिकता बताते हैं, दूसरी ओर काग्रेस का वरिष्ठ नेता आतंकवादियों के साथ हुई मुठभेड़ पर ऐसे समय में सवाल खड़ा करता है, जब न केवल साक्ष्य, बल्कि उसी मुठभेड़ का हिस्सा रहा एक आतंकवादी पुलिस की गिरफ्त में हो और पूछताछ में मारे जाने वालों के आतंकी गतिविधियों में शामिल होने की पुष्टि कर रहा हो। क्या इस दोमुंहेपन की नीति से आतंकवाद का सामना किया जा सकता है?

लखनऊ के संवाददाता सम्मेलन में दिग्विजय सिंह ने जो कहा, उससे पलटते हुए दिल्ली में यह कहा कि वह मुठभेड़ को फर्जी बताने की स्थिति में नहीं हैं। इसके बाद भोपाल में उन्होंने अपने आजमगढ़ दौरे का स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि आजमगढ़ के कई मुस्लिम युवाओं पर चार राज्यों में पचास से अधिक मामले लादे गए हैं और इसीलिए उन्हें लगता है कि इनके निपटारे के लिए विशेष न्यायालय व सीबीआई की मदद लेनी चाहिए और उन्हें जबरन फंसाने के लिए झूठे प्रकरण नहीं लादने चाहिए। यह कैसी मानसिकता है?

पिछले दिनों पुलिस के हत्थे चढ़े शाहजाद अहमद पर दिल्ली के सीरियल बम ब्लास्ट के साथ बटला मुठभेड़ में शामिल होने का आरोप है। पूछताछ में उसने मारे गए युवाओं को अपना साथी बताया है। फिर इसके एक दिन बाद दिग्विजय उन मृतकों के परिजनों से मिलने क्यों गए? जाच एजेंसियों पर सवाल खड़ा करने वाले कठमुल्लों से मिलकर देश की कानून-व्यवस्था को लाछित क्यों किया? आजमगढ़ के कट्टरपंथी मुसलमानों को 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' और उच्च न्यायालय द्वारा की गई जाच पर भरोसा नहीं है तो अब मुठभेड़ की जाच किससे कराई जाए?

वस्तुत: आतंकवाद को लेकर काग्रेस का दोहरापन छिपा नहीं है। बटला हाउस मुठभेड़ में दो पुलिस कर्मियों की भी मौत हुई थी। अपने जवानों की शहादत को अपमानित करते हुए काग्रेस के कुछ नेता मुठभेड़ के फौरन बाद बटला हाउस पहुंचे थे, जहा मुस्लिम वोट बैंक की खातिरदारी में मुलायम सिंह यादव सरीखे नेता पहले से ही विराजमान थे। सत्तासीन काग्रेस ने अपने नेताओं को आतंकवादियों का साथ देने वाले कट्टरपंथी तत्वों से दूरी बनाने का निर्देश देने की बजाए सुरक्षाकर्मियों पर सवाल खड़ा किया, जिन्होंने सभ्य समाज को लहूलुहान करने वाले दहशतगदरें को गिरफ्तार करने के लिए अपनी जान दाव पर लगा दी थी। सुरक्षाकर्मियों द्वारा मुस्लिम समाज के उत्पीड़न का आरोप समझ से परे है। न तो पुलिस और न ही सरकार ने आतंकवाद को लेकर मुस्लिम समुदाय को कठघरे में खड़ा किया है। आजमगढ़ के मुसलमानों के लिए यदि यह देश सर्वोपरि है तो उन्हें अपने समुदाय में छिपे उन भेड़ियों की तलाश करनी चाहिए, जो दहशतगदरें को पनाह देते हैं। मुंबई पर इतना बड़ा आतंकी हमला हुआ, क्या वह सीमा पार कर अचानक घुस आए जिहादियों के द्वारा संभव था? मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथियों द्वारा ऐसे मददगारों को संरक्षण क्यों मिलता है? और ऐसे कट्टरपंथियों के समर्थन में पूरा समाज किस जुनून में आ खड़ा होता है? आतंकवाद के सिलसिले में जिन युवकों की गिरफ्तारी हुई है, उन पर इस देश के संविधान के अनुरूप कानूनी कार्रवाई चल रही है। हाल में कोलकाता स्थित अमेरिकी दूतावास पर हमला करने वालों को लंबी सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने दंडित किया है। वषरें की सुनवाई के बाद सन 1993 में मुंबई में बम विस्फोट करने वालों में से कुछ को अब सजा सुनाई गई है, कई रिहा कर दिए गए। इस देश की कानून-व्यवस्था की निष्पक्षता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि मुंबई हमलों में जिंदा पकड़ा गया अजमल कसाब सरकारी मेहमान बना हुआ है। उसके खिलाफ वीडियो फुटेज हैं, चश्मदीद गवाह हैं, किंतु सुनवाई चल रही है। ऐसे में मुस्लिम प्रताड़ना का आरोप समझ से परे है।

मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ काग्रेस का याराना नया नहीं है। शाहबानो प्रकरण इसका ज्वलंत प्रमाण है। सच्चर और रंगनाथ आयोग के बहाने मुसलमानों की दयनीय दशा के एकमात्र उद्धारक होने का ढोंग करने वाली काग्रेस ही वस्तुत: उनके पिछड़ेपन का कसूरवार भी है। करीब साठ सालों तक देश पर काग्रेस का शासन रहा है। यह समुदाय पिछड़ा ही बना रहा। वही काग्रेस अब उनके उत्थान के लिए अलग से आरक्षण देने का झासा दे रही है। काग्रेस के लिए मुस्लिम समुदाय एक वोट बैंक से अधिक नहीं है और यह बात जागरूक मुसलमानों की समझ में आने लगी है।

[बलबीर पुंज: लेखक भाजपा के राज्यसभा सासद हैं]
साभार दैनिक जागरण

Monday, January 4, 2010

केंद्र सरकार की मज़बूरी

नक्सलियों से निपटने की रणनीति में बदलाव समय की मांग हो सकती है, लेकिन यह शुभ संकेत नहीं कि पश्चिम बंगाल और झारखंड की नई सरकार का रवैया केंद्र से मेल नहीं खा रहा। नक्सलियों से चाहे जैसे निपटा जाए, लेकिन केंद्र और नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में तालमेल होना प्राथमिक आवश्यकता है। यह निराशाजनक है कि नक्सलवाद का मुकाबला करने के तमाम वायदों और तैयारियों के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों के बीच आवश्यक तालमेल कायम होता नजर नहीं आ रहा। नि:संदेह इसका लाभ नक्सली संगठन उठा रहे हैं। उन्होंने न केवल आपस में बेहतर संपर्क स्थापित कर लिए हैं, बल्कि खुद को आधुनिक हथियारों से भी लैस कर लिया है। यही कारण है कि वे पुलिस और सुरक्षा बलों पर हमले करने और जनजीवन को बाधित करने में सक्षम हो गए हैं। झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में तो वे जब चाहते हैं तब आसानी से बंद आयोजित करने में सफल हो जाते हैं। यह समझ पाना कठिन है कि जब केंद्र सरकार को उनके खिलाफ कोई सीधी कार्रवाई नहीं करनी थी तो फिर ऐसा माहौल क्यों बनाया गया कि उनसे दो-दो हाथ किए जाएंगे? यह विस्मृत नहीं किया जा सकता कि नक्सलियों के खिलाफ सैन्य बलों और यहां तक कि वायुसेना के इस्तेमाल को लेकर भी व्यापक चर्चा छिड़ी। अब यह कहा जा रहा है कि नक्सलियों को निशाना बनाने के बजाय उनकी घेरेबंदी की जाएगी और उन तक हथियारों एवं अन्य सामग्री की आपूर्ति को रोका जाएगा। यह जानना कठिन है कि इसके पहले इस पर विचार क्यों नहीं किया गया कि नक्सलियों को हथियारों की आपूर्ति रोकने की जरूरत है? पिछले कुछ वर्षो में नक्सलियों ने जैसे आधुनिक हथियार एवं विस्फोटक पदार्थ जुटा लिए हैं उससे यही प्रतीत होता है कि इसके पहले उनकी सप्लाई लाइन को बाधित करने पर विचार ही नहीं किया गया। देखना यह है कि अब ऐसा करने में सफलता मिलती है या नहीं? निश्चित रूप से केवल इतने से ही नक्सलियों के मनोबल को तोड़ना कठिन है, क्योंकि अब वे इतने अधिक दुस्साहसी हो गए हैं कि हथियारों के लिए पुलिस थानों पर भी हमला करने में संकोच नहीं कर रहे हैं। पुलिस थानों और सुरक्षा बलों के ठिकानों पर नक्सलियों के हमले यह भी बताते हैं कि किस तरह पुलिस को आवश्यक संसाधनों से लैस करने में अनावश्यक देरी की गई। यह निराशाजनक है कि इस मोर्चे पर राज्य सरकारें अभी भी तत्पर नजर नहीं आतीं। यह एक तथ्य है कि पुलिस सुधारों के मामले में राज्य सरकारों का रवैया ढुलमुल ही अधिक है। यह विचित्र है कि राज्य सरकारें पुलिस सुधारों के मामले में न तो उच्चतम न्यायालय के निर्देशों पर अमल करने के लिए आगे बढ़ रही हैं और न ही सुरक्षा विशेषज्ञों के सुझावों पर। आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में रेखांकित किए जा रहे नक्सलवाद का मुकाबला करने के मामले में सबसे अधिक निराशाजनक यह है कि केंद्र और राज्यों के बीच इस पर कोई आम सहमति कायम नहीं हो पा रही है कि नक्सलियों को सही रास्ते पर कैसे लाया जा सकता है?
साभार दैनिक जागरण

Thursday, December 31, 2009

घुट-घुट कर जी रहा कानू सान्याल

ठ्ठमधुरेश, हाथीघिसा (पश्चिम बंगाल) विचारधारा जीवन को एक दायरे में बांधती है और जीने का जोश देती है, लेकिन जब वह भटक जाती है, तो जी का जंजाल बन जाती है। झंडाबरदारों को तो दुर्दिन दिखाती ही है, विकृति बन उस समाज को भी पेरती है, जो उसके केंद्रबिंदु में होता है। कुछ ऐसा ही हुआ है नक्सलवादी विचारधारा के साथ। कम से कम कानू सान्याल को देखकर तो यही लगता है। कभी देश-समाज को बदलने का सपना देखने वाले शख्स को हर उस व्यक्ति से शिकायत है, जिससे उसने उम्मीद बांधी थी। वैचारिक रिश्ते तो साथ छोड़ गए, अंतत: खून का रिश्ता ही काम आ रहा है। भाई के खर्च पर 81 साल के कानू की जिंदगी की गाड़ी जैसे-तैसे खिंच रही है, अब कोई हाल-खबर लेने भी नहीं आता है। पश्चिम बंगाल के एक गांव की झोपड़ी में नक्सलवाद का कथा पुरुष घुट-घुटकर मर रहा है। भाई पैसा न दे, तो कानू सान्याल सांस चालू रखने वाली दवा भी न खा सकें। ठीक बगल की झोपड़ी में रोज मौत की बुलाती एक औरत, साथियों की चरम दगाबाजी की निशानी है। फिर भी दोनों को कोई मलाल नहीं; मदद की अपेक्षा भी नहीं। और ऐसे ही कई और गुणों के चलते दोनों जनता के लड़ाकों के लिए नसीहत हैं। दोनों गवाह हैं कि कैसे और क्यों कोई आंदोलन बीच रास्ते से भटक जाता है; जनता बेच दी जाती है? वाकई, कानू सान्याल और लखी होना मुश्किल है। अभी के दौर में तो असंभव। कानू दा, नाम के मोहताज नहीं हैं। मगर लखी को हाथीघिसा पहुंचकर ही जाना। वे भारत में नक्सलवादी आंदोलन के प्रारंभिक कमानदारों में एक जंगल संथाल की बेवा हैं। जंगल, नक्सलबाड़ी का लड़ाका। चारु मजूमदार, खोखोन मजूमदार, सोरेन बोस, कानू सान्याल का हमकदम। खैर, कानू दा 81 साल के हो चुके हैं। बीमार हैं। दो अखबार लेते हैं। सामने के खेत, खुला आकाश, उड़ते पंछी, चरते जानवर, चिथड़ों में लिपटे नंगे पांव स्कूल जाते नौनिहाल ..,चश्मे के पीछे से सब देखते हैं। कुछ भी तो नहीं बदला! यही उनकी घुटन है। उन्होंने इसी सबको बदलने के लिए भारतीय व्यवस्था को चुनौती दी थी। कई राज्यों की पुलिस तलाशती थी। .. और अब गुटीय लाइन पर अपने भी मिलने नहीं आते। कानू की जिंदगी बड़ी मुश्किल से गुजर रही है। प्रदीप सान्याल (भाई) के पैसे से दवा खरीदी जाती है। चूंकि कार या पेट्रोल की हैसियत नहीं है, सो चाहते हुए भी कहीं निकल नहीं पाते। कानू दा को यह बात बहुत कचोटती है कि कभी साथी रहे लोग या उनकी सरकार (पश्चिम बंगाल का माकपा राज) ने मरणासन्न अवस्था में भी उनकी सुधि नहीं ली। बुद्धदेव भट्टाचार्य (मुख्यमंत्री) सार्वजनिक सभाओं में अक्सर कहते हैं-पश्चिम बंगाल में अब कोई नक्सली नहीं रहा। एक कानू बाबू है। उनको भी हम अपने साथ करना चाहते हैं। यह मुनादी है कि कैसे नक्सल आंदोलन के किरदारों को उनके ही पुराने साथियों (माकपा) ने दबाया, कुचला? ऐसे में सहयोग की अपेक्षा बेकार है। और हम ऐसा करते भी नहीं-कानू दा बोले। झोपड़ी में रह रहे कानू सान्याल बैचलर हैं।
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तार-तार हो गया उल्फा का आधार


तार-तार हो गया उल्फा का आधार

तार-तार हो गया उल्फा का आधार
गुवाहाटी : असम को भारत से अलग करने के ख्वाब के साथ 1979 में बनाया गया यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम (उल्फा) इन दिनों उथल-पुथल भरे दौर से गुजर रहा है। अपने आधार की वजह से उल्फा ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के संरक्षण में बांग्लादेश में अपने पांव जमा लिए थे, लेकिन उसे अब वहां बने रहने में दिक्कत हो रही है। पिछले साल शेख हसीना की सरकार की स्थापना, धार्मिक कट्टरवाद और उग्रवाद के विरोध में उठाए गए कदमों और शायद इस एहसास की बदौलत कि अब भारत को और नाराज नहीं किया जा सकता, उस देश में सक्रिय उल्फा तथा दूसरे उग्रवादी संगठन हताशा में सुरक्षित पनाहगाहों की तलाश में हैं। इसलिए उल्फा प्रमुख, परेश बरुआ के चीन पहंुच जाने और बांग्लादेश में मौजूद इस संगठन के सदस्यों के म्यांमार से संरक्षण मिलने की खबरों से हैरानी नहीं होनी चाहिए। लेकिन म्यांमार में भी उन्हें हालात की प्रतिकूलता का अंदाजा होने लगा है। खबर थी कि नवंबर के पहले सप्ताह में म्यांमार आर्मी ने उल्फा के एक कैंप को घेर लिया था और वहां करीब 100 उग्रवादियों पर हमला बोल दिया था। इस पृष्ठभूमि में संगठन के दो शीर्ष नेताओं विदेश सचिव शशधर चौधरी और वित्त सचिव चित्रबन हजारिका की गिरफ्तारी महत्वूपर्ण हो जाती है। बीएसएफ के अनुसार इन दोनों ने त्रिपुरा में आत्मसमर्पण किया था। इससे महज 48 घंटे पहले उल्फा ने दावा किया था कि इन दोनों को 1 नवंबर को ढाका में उनके घरों से गिरफ्तार किया गया था। 7 नवंबर को चीफ जूडिशियल मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने के बाद जब इन दोनों को गुवाहाटी लाया गया, तो उन्होंने मीडिया को बताया कि उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया था बल्कि सादी वर्दी में कुछ लोगों ने उन्हें ढाका में उनके घरों से उठाया था और फिर उन्हें भारत को सौंप दिया था। खैर हकीकत यह है कि दोनों जेल में हैं। यही नहीं इसके कुछ दिन बाद ही उल्फा का चेयरमैन अरबिंद राजखोवा और डिप्टी कमांडर इन चीफ राजू बरुआ की गिरफ्तारी ने तो उल्फा की कमर ही तोड़ दी। उल्फा के लिए यह गठन के 30 साल में सबसे बड़ा झटका था। सवाल उठता है कि अब उल्फा क्या रुख अपनाएगा? जून 2008 से इकतरफा संघर्ष विराम करने वाले वार्ता-समर्थक धड़े के चोटी के एक उल्फा लीडर, मृणाल हजारिका के हवाले से एक अखबार ने लिखा है कि अगर राज्य को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने की हमारी मांग पर वे सहमत हो जाते हैं, तो शांति वार्ता शुरू करने का हम आधार तैयार कर सकते हैं। हम समझ चुके हैं कि असम के लिए पूर्ण प्रभुसत्ता की मांग करना व्यावहारिक नहीं है। इसलिए हम, लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए शांति वार्ता के पक्ष में हैं। ऐसे में या तो शशधर-चित्रबन की जोड़ी, शांति वार्ता की बजाए अपने क्रांतिकारी रुख पर कायम रहते हुए जेल जाना पसंद करेंगे, या वे मृणाल हजारिका गुट में शामिल हो जाएंगे और शांति प्रक्रिया को सार्थक बनाएंगे, या फिर वे अपने कानूनी और तथाकथित मानवाधिकार सलाहकारों की मदद से एक नई साजिश के लिए कोई चतुराई भरा कदम उठाएंगे। साथ ही, हो सकता है कि वार्ता-विरोधी धड़ा इन दो लोगों के पकड़े जाने का बदला लेने के लिए अपने परिचित तौर-तरीकों से मासूम स्त्री-पुरुषों और बच्चों को आतंकित करे। ऐसे किसी हमले को रोकने के लिए खुफिया विभाग को कुशलता और सतर्कता का परिचय देना होगा। परेश बरुआ के नेतृत्व वाला गुट यह साबित करने की पुरजोर कोशिश करेगा कि अभी उसमें दम है। अपने शुरूआती सालों में समाज सुधार के अपने स्वरूप से उल्फा ने एक लंबा रास्ता तय करके संगठन के खिलाफ भारतीय सेना के आपरेशन बजरंग और आपरेशन राइनो के बाद 1990 के सालों में असम छोड़कर बांग्लादेश चले जाने के बाद आईएसआई के समर्थन से उसने आतंकवादी नकाब ओढ़ लिया है। इसी प्रकार से असम के लोगों ने भी एक लंबा सफर तय किया है। अब वे उल्फा द्वारा दिखाए गए सपने से दूर होकर उसके आतंकवादी स्वरूप को पहचान चुके हैं, जो आज विदेशी ताकतों के इशारों पर खेल रहा है। (अडनी)
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Wednesday, December 30, 2009

देश को आतंकवाद से ज्यादा छलनी कर रहा नक्सलवाद


देश को आतंकवाद से ज्यादा छलनी कर रहा नक्सलवाद


नई दिल्ली : देश में मुंबई हमले के बाद आतंकवाद से निबटने के लिए अलग तंत्र और कानून बनाने के लिए जोरदार तरीके से कवायद शुरू की गई। शायद इसी कारण इस साल आतंकवाद की कोई बड़ी वारदात सामने नहीं आई। लेकिन देश में दहशत बरकरार रखने में नक्सलियों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। हालत तो यह है कि आतंकवाद पर भी नक्सलवाद भारी पड़ रहा है। सरकार माओवादियों को लेकर लेकर चाहे जो दावे कर रही हो पर वास्तविकता यह है कि वह माओवादियों पर काबू पाने में असफल रही है। नक्सली हिंसा में इस साल 31 अक्टूबर तक 742 लोग मारे जा चुके हैं। यह संख्या पिछले साल मारे गए लोगों से कहीं ज्यादा है। सरकार के आंकड़ों पर यकीन करें तो नक्सलवादी आतंकवादियों से चार गुना ज्यादा घातक सिद्घ हो रहे हैं। पिछले दिनों गृहमंत्री पी. चिदंबरम राज्यसभा में यह कह रहे थे कि किसी भी मुद्दे पर नक्सलियों से बातचीत करने को तैयार हैं तो उसी समय उनके मंत्रालय द्वारा कुछ आंकड़े सदन में पेश किए गए, जो कि काफी चौंकाने वाले हैं। एक सवाल के जवाब में गृह राज्यमंत्री अजय माकन द्वारा दिए गए इन आंकड़ों के मुताबिक इस साल 31 अक्टूबर तक नक्सल प्रभावित राज्यों में नक्सली हमलों में 742 सुरक्षाकर्मी और आम नागरिक मारे गए हैं। 2008 में यह संख्या 721 थी। पूर्वोत्तर में पिछले साल 572 आम नागरिक और सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। सुरक्षाबलों ने इस दौरान 640 नक्सलियों को मार गिराया। गृह मंत्रालय के आंकड़ों को मानें तो जम्मू कश्मीर में आतंकवाद पर अंकुश लगाने में सुरक्षा बल काफी हद तक कामयाब रहे हैं। इस साल उक्त अवधि में 123 आम नागरिक और सुरक्षाकर्मियों की जानें गईं हैं जबकि सुरक्षा बलों ने 212 आतंकियों को मार गिराया है। पिछले साल 166 आम नागरिक और सुरक्षाकर्मी मारे गए थे और 339 आतंकियों को सुरक्षा बलों ने मारा था। कई महीनों तक चुपचाप तैयारी करने के बाद आखिर केंद्र सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ अपना अब तक का सबसे बड़ा अभियान छेड़ दिया है। सूत्रों के अनुसार फिलहाल यह अभियान छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र तक सीमित रहेगा। दोनों राज्यों में सीआरपीएफ, बीएसएफ और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के 45 हजार जवान भेजे गए हैं। बाद में इससे भी ज्यादा आक्रामक और बेहतर समन्वय वाला अभियान झारखंड और उड़ीसा में छेड़ा जाएगा। छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के सबसे ज्यादा 37 हजार जवान तैनात किए जा रहे हैं। शुरुआत में 25 हजार जवान भेजे गए हैं। बाद में कश्मीर से हटाकर 12 हजार जवानों को विशेष ट्रेनिंग देकर राज्य में भेजा जाएगा। उम्मीद की जाती है कि इस सबसे बड़ी संख्या में सरकार सख्ती से निपटेगी। (अडनी)

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Monday, September 1, 2008

इस्लामी आतंकवाद का असली पैरोकार बना सिमी


राजीव कुमार

यूँ तो भारत वर्षों से आतंकवाद का दंश झेलता रहा है, लेकिन पहले यह केवल कश्मीर घाटी तक सीमित था। किन्तु समय बीतने के साथ-साथ पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने अपना ध्यान देश के अन्य शहरों में भी देना शुरू किया। पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों ने अपनी रणनीति बदलते हुए भारत के अंदर आतंकी समूह बनानी शुरू की और स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया अर्थात सिमी के रूप में उसे एक मजबूत और भरोसेमंद साथी भी मिला। आज हालात यह है कि सिमी अपने दम पर देश भर में आतंकी कार्रवाइयों को बेखौफ होकर अंजाम दे रहा है। सिमी का मानस पुत्र इंडियन मुजाहिदीन इस्लाम के नाम पर अपने कुकृत्यों को जायज ठहराता है।भारत ही नही विश्व भर में आतंकियों का एक ऐसा संगठन है, जो इस्लाम के नाम पर अन्य धर्मावलंबियों की खात्में की बात करता है। इन संगठनों के द्वारा चलाये जा रहे इस्लामिक आतंकवाद ने पूरे दुनिया में तांडव मचा रखा है। इसके आतंक से पूरी दुनिया त्राहि माम-त्राहि माम कर रही है। ये इस्लामिक आतंकवादी कुरान की कुछ आयतों का सहारा लेकर पूरी दुनिया से काफिरों को खत्म कर इस्लामिक राज्य की स्थापना करने का दु:स्वप्न देख रहे हैं। ये आतंकी अपनी आतंककारी, विध्वंसक घटनाआें को अंजाम देने में कुरान के आयतों का हवाला देकर इसे जायज ठहराने से गुरेज नही करते। वैसे आमतौर पर देखा जाता है कि इस्लाम के मानने वाले कट्टर मुसलमान कहीं भी हो वो उस देश के कानून, संविधान, राष्ट्रीय गीत को नही मानते हैं।हिन्दुस्तान में भी मुसलमानों का एक कट्टरपंथी वर्ग जो जिन्ना के मानसिकता का है, वो आतंकियों के इस इस्लामिक जेहाद का समर्थन कर रहा है। और वह पाकिस्तान के खुफिया एजेंसी आईएसआई के हांथों का खिलौना बनने को तैयार हो गया है। कश्मीर का ही उदाहरण लिया जाए तो वहां भारत सरकार ने कितना आर्थिक सहयोग किया है, कितनी सुविधाएं मुहैया कराईं हैं मगर कश्मीर के मुसलमान उस सहयोग को हवा में उड़ा देते हैं। वे सिर्फ पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने और वहां के झंडे फहराने में ही अपनी वफादारी समझते हैं। कश्मीरी मुसलमानों कीे भारत की धर्म निरपेक्षता में जरा सी भी आस्था नही है। वहां की पीडीपी, नेशनल कांग्रेस जैसी सरीखी पार्टियां भी अलगाववादियों के सुर में अपना सुर मिला रही हैं।आज विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम देने वाले आतंकियों व देश में इनका समर्थन करने वाले कट्टरपंथियों के कारण हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था खतरे में है। वैसे इस देश में लोकतंत्र तभी तक कायम रहेगा जब तक हिन्दू बहुसंख्यक है। मुसलमानों के बहुसंख्यक होने पर यह अपने धर्मनिरपेक्ष छवि को कायम नही रख पाएगा। दुरर्र्र््भाग्य से कुछ राजनीतिक पार्टियां अपने मुस्लिम परस्ती रणनीति व वोट बैंक के चलते आतंकवाद को और बढ़ाने का काम कर रही हैं। सपा के आका मुलायम सिंह खुलकर सिमी का समर्थन कर रहे हैं। अभी हाल ही में माननीय न्यायधीश श्रीमती गीता मित्तल की अध्यक्षता वाली पंचाट पीठ ने सरकार पर सिमी पर प्रतिबंध जारी रहने के पक्ष में पर्याप्त सबूत न देने का आरोप लगाते हुए सिमी पर से प्रतिबंध हटा दिया तो लालू यादव, राम विलास पासवान जैसे नेता बड़ी बेशर्मी और बेहयाई से इसका स्वागत किया।जिस राष्ट्र के नेता आतंकवाद जैसी देश को विध्वंस करने वाली घटनाओं का जिसमें हजारों बेगुनाहों की अकाल मौत हो जाती है, का भी पूरी तरह से राजनीतिकरण कर दिये हों, वहां पर आतंकवाद नासूर बनेगा ही। संभव है कि देश को रसातल में जाने में देर नही लगेगी। इतिहास साक्षी है कि यह देश अपने देश के गद्दारों के कारण ही हारा है। आज इतिहास अपने आप को एक बार फिर दुहरा रहा है। भला हो उच्चतम न्यायालय का जिसने अपने विवके का इस्तेमाल करते हुए सिमी पर प्रतिबंध जारी रखा। इस केन्द्र सरकार से पूंछा जाना चाहिए कि जो साक्ष्य व तथ्य वो अब उच्चतम न्यायालय के समक्ष रख रही है वही साक्ष्य व तथ्य उच्च न्यायालय के पंचाट के समक्ष क्यों नही रखा। पूरे देश को यह जानने का अधिकार है कि श्रीमती गीता मित्तल की अध्यक्षता वाली पंचाट पीठ ने ऐसा आरोप क्यों लगाया कि ''सरकार ने सिमी पर प्रतिबंध लगाने के पर्याप्त सबूत नही पेश किये''। मगर सच्चाई यही है कि संप्रग की सरकार ने पोटा जैसे कानून को आतंकियों के भलाई के लिए हटाया। आज आतंकवाद का बढ़ना इसी का दुष्परिणाम है।इस देश में आतंकियों का समर्थन करने वाले राजनीतिक दलों के नेताओं को इंडिया टुडे में छपे अप्रैल, 2003 के उस साक्षात्कार को जरूर पढ़ना चाहिए जिसमें सिमी के मुखिया सफदर नागौरी ने बड़े बेबाकी से कहा था कि हिन्दुस्तान को सबक सिखाने के लिए आज महमूद गजनवी की जरूरत है। मुस्लिमों के रहने के लिए यह देश तभी मुकम्मल होगा जब यहां इस्लाम का शासन होगा। इतना ही नही सिमी खुलकर अलकायदा व आजाद कश्मीर का समर्थन करता है। सिमी के आका नागौरी के नारको टेस्ट के बयान को सुनें तो पता चलता है कि अलीगढ़ में सिमी की व्यापक गतिविधियां हैं। सिमी अब सिमी के नाम से ही नही बल्किी इंडियन मुजाहिदीन के नाम से भी अपनी गतिविधियों को जारी किये हुए हैं।सिमी का संबंध अरब की राबता कमेटी के छात्र संगठन बामी और इंटरनेशनल इस्लामिक फेडरेशन ऑफ स्टूडेंट से भी है। सिमी के ही गुर्गों ने 2002 में गुप्तचर ब्यूरो के राजन शर्मा का अपहरण कर अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय के हबीब हॉल में ले जाकर बर्बरता पूर्वक वस्त्र विहीन करके पीटा था। 1997 में अलीगढ़ के सिविल लाइन क्षेत्र में सिमी का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था, जिसमें सिमी के कई प्रमुख नेता उपस्थित थे। उन दिनों नागौरी सिमी का राष्ट्रीय महासचिव था। खुफिया सूत्रों के मुताबिक वर्ष 2001 में सिमी पर प्रतिबंध लगा तो इस संगठन के दो फाड़ हो गए। एक गुट हार्ड लाइन था तो दूसरा लिबरल कोर।इतना ही नही सिमी के कार्यकर्ता आतंकवाद का प्रशिक्षण लेने पाकिस्तान-अफगानिस्तान के दौरे पर अक्सर जाते रहते हैं। गुजरात, कर्नाटक बम विस्फोट इसके ताजा उदाहरण हैं। सिमी कानपुर में भयानक दंगा करा चुका है। इसमें सिमी ने कानपुर में कुरान जलाने की झूठी अफवाह फैला दी, इससे कानपुर कई दिनों तक दंगों की आग में जलता रहा। कई बेकसूरों की बलि चढ़ी और अरबों-खरबों की संपत्ति श्वाहा हो गई। सिमी को भारत की धर्म निरपेक्षता फूटी आंखों भी नही सुहाती है। सिमी भारत को एक इस्लामिक मुल्क बनाना चाहता है। इसी के कारण उसका आदर्श अमेरिका का मोस्ट वांटेड ओसामा बिन लादेन व दुनिया में तबाही मचाने वाला तालिबान हैं।यही नही मदरसों में भी सिमी की भारी घुसपैठ है। क्योंकि यहां इस्लाम और कट्टरता की शिक्षा उसके कंटकाकीर्ण मार्ग को और सुगम बना देते हैं। इन मदरसों को चलाने के लिए सिमी को विपुल मात्रा में अरब देशों से धन मिल रहा है। कुछ अर्सों से अरब, सीरिया, ईरान का रूझान मुस्लिम कट्टरपंथी देशों की तरफ हुई है। ये मुस्लिम देश भारत में अपने पक्ष में भारी जनमत बनाना चाहते हैं।विशेषकर अमेरिका विरोधी जेहाद में क्यूबा, ईरान, सीरिया आदि देशों की संदेहास्पद भूमिका से खुफिया एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। सिमी के पक्ष में कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं का आना मुस्लिम तुष्टीकरण का भी तुष्टीकरण है। मुसलमानों का वोट हासिल करने के लिए यह गंदा खेल पूर्व में कांग्रेस खेलती थी मगर इस खेल में अब क्षेत्रीय दल भी पारंगत हो गए हैं। यहां तक कि वामदल भी मुस्लिमों को तुष्ट करने में किसी से पीछे नही है। उनके द्वारा पश्चिम बंगाल में सत्ता के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों को समर्थन देना जग जाहिर है। पिछले केरल विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों ने मुस्लिमों को रिझाने में कोई कोई कोर-कसर नही छोड़ी। राजनीतिक दलों द्वारा वोट बैंक के खातिर मुस्लिमों के प्रति पूर्ण समर्पण देश को कहीं का नही छोड़ेगी। क्योंकि जब सिमी जैसे आतंकी संगठनों की तरफदारी खुलकर राजनीति के बाजार में होने लगती है तो देश का हित चाहने वाले लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंचना स्वाभाविक है।अभी हाल ही में राजस्थान और कुछ दूसरे प्रदेशों में जेहादी घटनाओं को अंजाम देने वाले लश्कर और सिमी मोर्चे के एक संगठन ने एक घोषणा पत्र निकाला। इस घोषणा पत्र में चंद पंक्तियों को पढ़ने के बाद सब कुछ स्पष्ट हो जाता है कि वे हिन्दुओं के प्रति कितनी घृणा रखते हैं, उसके कुछ अंश इस प्रकार हैं - ''हिन्दुओं के खिलाफ जेहाद करना अल्लाह की इजाजत है। हिन्दू व कुछ अन्य हमारे विरोधी हैं। इसलिए उनके विरूध्द ज़ेहाद हमारी मजहबी अनुमति है। अगर हम लड़ते-लड़ते खत्म हो जाते हैं तो जन्नत में हमारे लिए काफी स्थान है।''इस घोषणा पत्र में और भी विष-वमन किया गया है-''हिन्दुओं को अपने 33 करोंड़ नंगे और गंदे देवताओं को मानने की गलती समझ लेना चाहिए। ये सारे हिन्दू मिलकर भी हमारे हांथों से कटती हुई गर्दनों की रक्षा नही कर पाएंगे।'* इस घोषणा पत्र में धमकी दी गई है कि ''अगर हिन्दू अपना रवैया नही बदले तो मुहम्मद गोरी और गजनवी फिर आकर इस देश में कत्लेआम करेंगे। हम यह भी दुनिया को दिखला देंगे कि इस धरती पर हिन्दुओं का खून सबसे सस्ता है।'' बाबरी ढांचा जमींदोह होने के बाद सिमी ने देश को गोरी, गजनवी द्वारा रौंदे जाने की याद दिलाई थी।एक ओर सिमी जैसे आतंकवादी संगठनों की आक्रामकता तो दूसरी ओर कांग्रेस की आतंकवाद पर लुंजपुंज, ढीली व नरम रवैया देश में विध्वंसकारी घटनाओं को बढ़ाने में भारी मदद कर रही है। इस देश को पता है कि आंध्र प्रदेश में कांग्रेस ने माओवादियों के साथ समझौता करके चुनाव जीता था। बाद में उन्हें भारी रियायतें दी गई। इसी प्रकार पूर्वोत्तर के राज्यों में उसने उल्फा के साथ गठजोड़ कर फतह हासिल किया। यह सभी को विदित है कि चुनावों में उल्फा जैसे आतंकी संगठनों की मदद से चुनाव में जीत हासिल करने के बाद उन्हें तमाम तरह के छूट व मदद करने की कांग्रेस की पुरानी चाल रही है। जम्मू-कश्मीर में तो उसकी लंबी फेहरिस्त है। वहां तो कांग्रेस आतंकियों को कबाब और बिरियानी भी खिलाती थी। उनके पकड़े जाने की स्थिति में आतंकवादियों को सुरक्षित रास्ता भी देती थी।भोले-भोले बेगुनाह नागरिकों के खून की कीमत पर वोट बैंक की राजनीति करने का काम उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश जैसे अनेंक राज्यों में होता रहता है। कांग्रेस हमेशा इस बात से भय खाती रही कि आतंकवाद को सख्ती से कुचलने पर उसका मुस्लिम वोट-बैंक बिगड़ जाएगा। इससे यही साबित होता है कि कांग्रेस ने मुसलमानों को आतंकवाद का समर्थक मान लिया है। एक प्रकार से उसने आतंकवाद को मुस्लिम वोट बैंक से जोड़कर देश के धर्म निरपेक्ष मुसलमानों के साथ घोर अन्याय का काम किया है। यही वजह है जिसके चलते संसद पर हमला करने का मुख्य आरोपी अफजल गुरू की फांसी अनिश्चित काल के लिए रोक लगा दी गई है। और तो और कांग्रेस के एक मुख्यमंत्री गुलामनवी आजाद ने यह धमकी दी कि अगर अफजल गुरू को सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार फांसी दी गई तो श्रीनगर जलकर खाक हो जाएगा। कांग्रेस ने इसके बाद बड़े बेहयाई से घुटने टेक दिये।हकीकत यह है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में आतंकवाद के मसले पर सबसे नाकाम, नपुंसक और अक्षम सरकार साबित हुई है। कांग्रेस अपने विपक्षी पार्टी को बहुत सफाई से उत्तर देती है कि कारगिल पर हमला, तीन खूंखार आतंकवादियों को कंधार छोड़ना और अक्षरधाम पर हमला क्या था। यानी कि विपक्षी पार्टियों के शासन काल में आतंकवाद की घटनाएं हुई थी इसलिए हमारे शासन काल में ये घटनाएं दुहराई जाएंगी। यह सच्चाई है कि आतंकवाद की घटनाएं राजग सरकार के समय में हुई थी। ये घटनाएं अमेरिका तक में हो गई हैं और अभी हाल में चीन के सिक्यांग प्रांत में भी हुईं है। राजनीतिक दलों को चाहिए कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति न करें। वे एकता का परिचय देते हुए आतंकवाद के नासूर को जड़ से खत्म करें। इस मुद्दे पर राजनीति की जाएगी तो देश खोखला हो जाएगा। आज एक कड़े कानून की सख्त जरूरत है, जिससे आतंकवाद पर लगाम लगाया जा सके।कांग्रेस का कहना है कि पोटा से आतंकवाद पर काबू नही पाया जा सकता। इस कानून के द्वारा किसी एक वर्ग को परेशान किया जा रहा है। मगर कांग्रेस को यह याद रखना चाहिए कि जब एक ही वर्ग आतंकवाद में लिप्त पाया जा रहा है तो क्या हमारे सुरक्षा एजेंसियों को उनसे पूंछतांछ भी करने का हक नही है। उसके लिए भी सबूत दिया जाएगा तब बात हो सकती है। इस संवेदनशील मुद्दे पर अगर कोई दल राजनीति करता है तो यही समझा जाएगा कि वो इस देश का दुश्मन है। आने वाली पीढ़ियां ऐसी राष्ट्रद्रोही पार्टियों को कभी माफ नही करेंगी। मुसलमानों को भी पोटा जैसे सख्त कानून को लागू करवाने के लिए आगे आना चाहिए। आज कोई आतंकवादी घटना होती है तो यदि कोई मुसलमान पकड़ा जाता है तो कुछ मानवाधिकार संगठन झूठ-मूठ का हो-हल्ला मचाते हैं कि बेवजह मुसलमानों को परेशान किया जा रहा है। जबकि सैकड़ों लोग जब बम विस्फोटों में मारे जाते हैं तो ये मानवाधिकार संगठन सोए रहते हैं। मानों ये मानवाधिकार संगठन न होकर दानवाधिकार संगठन हैं।अभी हाल ही में यह निर्णायक प्रमाण मिले हैं कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन तथा उसके मित्र दलों का आतंकवाद के प्रति बिल्कुल नरम रवैया है, प्रमाण यह है कि कांग्रेस पार्टी के राम नरेश यादव, बसपा के अकबर अहमद डंपी और समाजवादी पार्टी के अबू आजमी ने मुफ्ती अबू बशीर के आजमगढ़ गांव का दौरा किया था। इसके अतिरिक्त दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम सैय्यद बुखारी ने भी मुफ्ती अबू बशीर के गांव का दौरा किया था- वो बशीर जो सिमी का मास्टर माइंड है तथा जिसे अहमदाबाद के धमाकों में लिप्त पाये जाने के कारण गुजरात पुलिस ने गिरफ्तार किया था। सनद रहे कि इन धमाकों में 55 बेगुनाह लोग मारे गए थे और करीब 150 घायल हो गए थे।जहां पूरे देश में गुजरात पुलिस द्वारा मुफ्ती अबू बशीर तथा अन्य नौ लोगों की इन धमाकों तथा देश के अन्य राज्यों में धमाके में लिप्त होने पर त्वरित गिरफ्तारियां होने तथा मामले का शीघ्रताशीघ्र खुलासा करने के लिए हर जगह प्रसंशा हो रही है वहीं कांग्रेस, सपा, बसपा और कांग्रेस के नेताओं ने आतंक के इन दोषियों के विरूध्द साक्ष्य की परवाह किये बिना उनके गांव का दौरा किया। इन राजनैतिक दलों के कुत्सित इरादे तब प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देते हैं, जब वे आतंक के विरोध में की जाने वाली किसी भी ठोस कार्रवाई को किसी संप्रदाय विशेष के विरूध्द कार्रवाई बताकर उनकी निंदा करते हैं।गृहमंत्री हकीकत जानने से इंकार करते हैं और इस्लामी आतंकवादियों को गुमराह किये गए बच्चे बताते हैं। इससे बड़ा तुष्टीकरण और क्या हो सकता है। सपा, बसपा, लोजपा और कांग्रेस द्वारा आतंकवादियों के साथ हमदर्दी का प्रत्यक्ष प्रदर्शन आतंकवाद को समर्थन देने के समान है। पूरे देश की जनता को चाहिए कि आतंक का समर्थन करने वाले इन नेताओं का चुनाव के समय बहिष्कार किया जाए। वर्ना इस देश का भविष्य ही विध्वंस हो जाएगा। जनता को चाहिए कि ऐसे नेताओं का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरें। तभी आतंकवाद पर लगाम लग सकता है। क्योंकि राजनीतिक नेता जनता की सहनशीलता को उसकी कमजोरी समझ रहे हैं।

Friday, July 20, 2007


अलकायदा और ओसामाबिन लादेन ?

दुनिया में इस्लामिक आतंकवाद के जरिए आतंक मचाने वाले अलकायदा संगठन की स्थापना 1988 में हुई थी। धीरे-धीरे अलकायदा ने मुस्लिम देशों से मदद लेकर अपने संगठन को काफी मजबूत कर लिया। आज कम से कम 60 देशों में अल-कायदा की गतिविधियां जारी है। शुरू में अल-कायदा ने यहूदियों, ईसाइयों के विरूध्द खूनी जंग जारी की, लेकिन बाद में अमेरिका और ब्रिटेन समेत कई देशों सहित अलकायदा ने दुनिया के सभी गैरमुसलमानों को अपने निशाने पर ले लिया। आज हिन्दू बहुल वाला देश हिन्दुस्तान इसके निशाने पर है। लादेन ने भारत को कई बार सीडियां जारी करके को धमकाया है और उसकी सीडियों को हल्के तौर नही लेना चाहिए। क्योंकि ये इस्लामी आतंकवादी अपने मंसूबों को कामयाब करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। तो फिर हम संक्षिप्त रूप में अलकायदा गतिविधियों और ओसामा के जीवन के बारे में संपूर्ण रूप से जानकारी लेते हैं।कट्टर इस्लामिक आतंकवादी ओसामा बिन लादेन का पूरा नाम ओसामा बिन मोहम्मद बिन लादेन अवाद बिन लादेन है। लादेन का जन्म 10 मार्च 1957 को रियाद, सउदी अरबिया में हुआ था। खुद ओसामा ने 1988 में अलजजीरा टीवी चैनल के एक इंटरव्यु में उसने अपना जन्म 10 मार्च, 1957 बताया। उसके पिता मोहम्मद अबाद बिन लादेन धनी व्यापारी थे। लादेन के जन्म के बाद उसकी मां ने उसके पिता से तलाक ले लिया और मुहम्मद अल अता से विवाह कर लिया। ओसामा की शिक्षा-दीक्षा जेद्दा में हुई। वहां उसने इकोनॉमिक और मैनेजमेंट पढ़ा। 1974 में लादेन ने 17 वर्ष की उम्र में अपनी मां के भाई की लड़की नजवा घनीम से विवाह किया। लादेन ने करीब चार औरतों से शादी किया जिसमें एक को तलाक दिया। ओसामा को कुल 12 से 24 बच्चे हैं। उसकी पत्नी नजवा के अनुसार 11 बच्चे बिन लादेन के उसने खुद जने हैं।ओसामा बिन लादेन की कद-काठी बड़ी लम्बी है। एफबीआई का उसके बारे में कहना है कि वह लम्बा और पतला है। वह 6 फुट 4 ईंच या 6 फुट 6 ईंच का है। यानी लगभग 193 से 198 से.मी. है। लादेन का वजन 165 पाउंड करीब 75 केजी है। वह हमेशा सफेद पगड़ी पहनता है और सउदी लिबास में रहता है।1991 में लादेन ने सूडान को अपना अड्डा बनाया, सूडान सरकार की मदद से भारी तादाद में प्रशिक्षण शिविर बनाए। लेकिन 1996 में तालिबान के नेतृत्व में लादेन और उसके मददगार सूडान छोड़कर दोबारा अफगानिस्तान आ गए। आज भी अलकायदा के पाकिस्तान में छिपे रूप से आतंकवादी शिविर सक्रिय हैं।लादेन का अफगान मुजाहिदीनों से गहरा संबंध रहा है। सन् 1979 में जब सोवियत सेनाओं का अफगानिस्तान में पूरी तरह आधिपत्य हो गया था, तब लादेन व उसके सहयोगियों ने अमेरिका के सहयोग से मुस्लिम गुरिल्ला मुजाहिदीनों को अच्छी तरह प्रशिक्षित किया। जिससे सोवियतसंघ के अफगानिस्तान में पैर उखड़ गए। लादेन जिस संगठन का कमांडर इन चीफ था उसका पूरा नाम अल-खदमत अल कायदा था। ओसामा धनी लादेन घराने से संबंध रखता है। इसके संबंध कई इस्लामिक आतंकवादी नेताओं से है। लादेन को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए 25 मीलियन डॉलर का ईनाम अमेरिका ने रखा है, मगर आज तक वह अमेरिका के चंगुल में नही आया।लादेन अपने जीवन में दो महत्वपूर्ण फतवे जारी कर चुका है। जिसमें पहला 1996 व दूसरा1998 में। लादेन ने 1996 में यह फतवा जारी किया था कि इस दुनिया में गैर मुसलमानो को मार डालना चाहिए। दूसरा यह कि संयुक्त राष्ट्र संघ व उसके सहयोगी देशों को इजरायल से समर्थन वापस ले लेना चाहिए। साथ में यह भी कि इस्लामी देशों में भेजी गई सेना को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वापस बुला लिया जाना चाहिए।अगर उसके खूनी दास्तान को जाने तो यूएस दूतावास दारे सलाम तंजानिया, नैरोबी व केन्या के बम विस्फोटों में उसको संलिप्त माना गया। आज बिन लादेन अमेरिका का मोस्ट वांटेड क्रीमिनल है। और, अमेरिका में 11 सितंबर, 2001 की दिल दहला देने वाली घटना के सारे सबूत लादेन की ओर इशारा कर रहे थे। इसके अतिरिक्त बहुत से विमानों के अपहरण में उसका हाथ माना जाता है। न्यूयार्क सिटी न्यूयार्क के वर्ड ट्रेड सेंटर का विनाश व पेंटागन को नुकसान पहुंचाने में उसका हाथ माना गया।भारत को एक बार नही दर्जनों बार भारी तबाही व बम विस्फोटों के जरिये भारी नुकसान करने की धमकी मिल चुकी है। हॉल के दिनों की कुछ धमकियों के बारे में संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है: 8 जून, 2007 को अलकायदा ने एक सीडी जारी करके भारत में भारी खून-खराबा करने की धमकी दी। 23 मई, 2007 मुम्बई स्थित जुड़वा वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को बम से उड़ाए जाने की धमकी के बाद भारी सुरक्षा मुहैया कराया गया। 23 सितंबर, 2006 को खुफिया एजेंसी द्वारा जानकारी के बाद भाखड़ा बांध, नरेंद्र मोदी, भाजपा नेता लालकृष्ण आडवानी, अटल बिहारी वाजपेयी, कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी की सुरक्षा में भारी वृध्दि की गई। 9 दिसंबर, 2006 को संसद पर हमले के दोषी आतंकवादी अफजल गुरू की रिहाई के लिए पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों द्वारा एक विमान को अपहरण करने की धमकी मिली। जिससे एयरपोर्टो पर सुरक्षा बढ़ाई गई।अभी हॉल में जून के दूसरे सप्ताह में एक सीडी जारी किया गया जिसमें भारत को तबाह करने की धमकी मिली है। इस सीडी की व्यापक जांच चल रही है।

Saturday, June 9, 2007



राजनैतिक स्वार्थों के चलते नक्सल

आतंकवाद नासूरबनता जा रहा है


राजीव कुमार

नक्सलियों द्वारा विहारी मजदूरों का सामूहिक नरसंहार, रानी बोदली का सामूहिक नरसंहार की याद देशवासियों को भूला भी न था कि तब तक 29 मई 2007 को माओवादी आतंकवादियों ने घात लगाकर छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में पुलिसबल के नौ कमांडरों को मार डाला। ये माओवादी हमले को अंजाम देने के पश्चात पुलिस के ढेर सारे असलहों को भी लूटा। सनद रहे कि अब ये माओवादी घात लगाकर हमले में बहुत तेज हो गए हैं। इससे पूर्व ये नक्सली रानीबोदली की घटना को घात लगाकर तब अंजाम दिया था जब पुलिस वाले शराब पीकर गहरी नीद में सो रहे थे। घात-प्रतिघात में तेज ये नक्सली हमले को इतने द्रुत-गति से अंजाम देते हैं कि सामने वाले को संभलने का मौका ही नही मिलता। अब माओवादी आतंकवादियों द्वारा रोज आए दिन एक न एक हत्या को अंजाम देना उनका क्रूरतम शगल बनता जा रहा है।

इस बार के ताजा हमले में राज्य की राजधानी से करीब 400 किमी दूर कुडुर गांव में माओवादियों से लोहा लेने पुलिस बल गए मगर हमले के लिए पहले से ही तैयार बैठे माओवादियों ने इन पुलिस वालों पर करीब 24 बारूदी सुरंगों का विस्फोट किया। साथ में बंदूकों, बमों से हमला कर नौ पुलिसकर्मियों को बर्बरता पूर्वक मार डाला।
आज नासूर बना नक्सलवाद विहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश में गहरी जड़े जमा लिया है। आंध्र प्रदेश के तेलांगना क्षेत्र में तो यह समानांत सरकार चलाने का दावा करता है। इसके अतिरिक्त नक्सली अब स्वयं अपनी अदालत लगाकर लोगों को सजाए मौत देने का ऐलान करने लगे हैं। अभी हाल में करीब मई की अंतिम सप्ताह में नक्सलियों ने स्वयं भू अदालत लगाकर पारस गंझू, जारू गंझू, सूकन गंझू और पसला को घर से निकाल कर बुरी तरह से पीटा और बाद में गोलियों से भून डाला। नक्सलियों ने अपनी अदालत में आरोप लगाया कि इन चारों ने अपने समर्थक मुकेश यादव का शव गायब कर दिया, जिसके कारण चारों को मौत की सजा सुनाई जाती है।

आज परिस्थितियां अलग हैं। नक्सलियों ने अपनी रणनीति में भारी बदलाव किया है। 1990 से नक्सलियों ने अपने संगठन को अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित करना शुरू किया था। नक्सली आंदोलन में 2004 में बड़ी तब्दीली तब आई जब दो बड़े संगठन माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर यानी एमसीसी और पीपुल्स वार ग्रुप का आपस में विलय हो गया और एक नए संगठन सीपीआई माओवादी का गठन हुआ और इससे इनकी ताकत में दोगुना इजाफा हो गया। इस विलय के बाद नक्सली वारदातों में भारी वृध्दि दर्ज की गई।

इस समय उल्फा करीब रोज आए दिन एक न एक घटनाओं को अंजाम दे रही है। 1979 से हो रहे खूनी हिंसा के तांडव में दोनों पक्षों के 20 हजार से ज्यादा लोग काल के गाल में समा चुके हैं। और इन गठजोड़ों के बाद नक्सलियों का गठजोड़ अब लिट्टे से भी हो चुका है। ये नक्सली लिट्टे को भारत में छिपने का ठिकाना उपलब्ध करा रहे हैं। इसके बदले में लिट्टे उन्हें खतरनाक भारी तबाही वाले हथियार बनाना सिखा रहा है। अभी हाल ही में राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर लिट्टे के समर्थन में नक्सलियों ने पूरी तरह बंद रखा। यह बंद 21 मई 2007 को सरकारी दमन विरोधी दिवस के तौर पर मनाया और इस दिन आंध्र और उड़ीसा के सीमावर्ती क्षेत्रों में बंद का भी आह्वान किया। नक्सलियों द्वारा बंद के इस आह्वान से लिट्टे-नक्सल गठजोड़ की आशंका की पूरी तरह पुष्टि हो गई।

सरकार को सारे स्वार्थों को दरकिनारा करते हुए आतंकियों को पूरी शक्ति के साथ सफाया करना चाहिए। ये नक्सली गरीबों के एक तपके को बहला-फुसलाकर उनके हांथो में बंदूक थमा देते हैं। सरकार को ऐसे गरीबों के पेट का ख्याल रखना होगा। नही तो वो दिन दूर नही जब नक्सलवाद के कारण पूरा देश धू-धू करके जल उठेगा।

Tuesday, June 5, 2007

नक्सली हिंसा के आगे घुटने टेकती सरकार

राजीव कुमार
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असम में बिहारी मजदूरों की नृशंस हत्या से देश उबर भी नहीं पाया था कि झारखंड में नक्सलियों ने सांसद सुनील महतो की हत्या कर यह दिखा दिया कि उनकी पहुंच कहां तक है और वे किस स्तर तक अपनें मंसूबे को पूरा कर सकते हैं। अपनें वारदातों को आगे बढ़ाते हुए नक्सलियों ने 15 मार्च 2007 गुरूवार की रात्रि को कभी न खत्म होनें वाली कालिमा के रूप में बदल कर रख दिया। नक्सली आंदोलन के इतिहास में इसके पहले किसी एक घटना में इतनें अधिक पुलिसकर्मी नहीं मारे गए थे। नक्सली आतंक के आगे केंद्र सरकार एकदम असहाय नजर आती है। नक्सलियों के बढ़ते हौसले व बेखौफ होनें का आलम यह है उन्होंने छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल क्षेत्र में दंतेवाड़ा जिले के रानीबोदली में पचास से ज्यादा पुलिसकर्मियों को अत्यंत क्रूरता व निर्ममता से मौत की नींद सुला दिया। करीब पिछले दो सालों से नक्सली हिंसा ने छत्तीसगढ़ में ज्यादा कहर बरपाया है। नक्सली आतंक की इस आग में पूरा छत्तीसगढ़ जलता नजर आ रहा है। छत्तीसगढ़ में पिछले दो सालों में 1000 से ज्यादा लोग नक्सली आतंक के शिकार हुए हैं। पिछले चार दशकों में नक्सली आंदोलन 13 से अधिक राज्यों में फैल चुका है। छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने 26 साल पूर्व बस्तर इलाके में सेंध लगाने की शुरूआत की थी और अब राज्य के 16 जिलों में से आठ में इसका प्रभाव है। केन्द्र सरकार नें भी नक्सली हिंसा को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है। देश के करीब 13 राज्य नक्सली आतंक से प्रभावित है। जहां आए दिन नक्सली कहर बरपा करता है, 160 जिलों में नक्सलियों की पैठ है और 55 में इनकी समानांतर सरकार है। देश के 25 से तीस प्रतिशत हिस्सों में इन्हीं का कानून चलता है। ये आंकड़ें बेहद खौफनाक हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा खौफनाक है केन्द्र सरकार की नक्सलियों के सामने ढुलमुल रवैया, विवशता, लाचारी और हार। जो दशकों से नक्सलवाद के तांडव-खूनी खेल को असहाय होकर उन्हें फलता-फूलता देखती नजर आ रही है।
अब इस स्थिति इतनी भयावह और बेकाबू हो गई है कि बंगाल के छोटे से इलाके नक्सलवाड़ी में किसानों को न्याय दिलाने की भावना से शुरू किया यह आंदोलन आज आतंकवाद के चौमुहानें पर बड़े द्रुत गति से बढ़ता जा रहा है। इसी का दुष्परिणाम है कि आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र,झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में मौत का खूनी तांडव बदस्तुर जारी है। नक्सलवाद का यह चेहरा आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक और खौफनाक नजर आ रहा है। क्योंकि इसमें किसी बाहरी का नहीं बल्कि अपना ही अक्श प्रतिबिम्बित हो रहा है।
बहरहाल कुछ भी हो लेकिन नक्सली अपनें खिलाफ चलाए जा रहे सलवाजुडूम आंदोलन से बेहद आक्रोशित हैं। इस आंदोलन की शुरूआत जगदलपुर के रानीबोदली इलाके से हुई थी। यहां नक्सली हमले की आशंका को भांपते हुए साल भर पहले ही रानीबोदली और करकेली गांव में पुलिस ने अस्थाई कैंप बनाए थे। पर सालों से कोई हमला न देख पुलिस बेहद लापरवाह हो गई थी। जहां पुलिस सो रहे थे वहां उनकी सुरक्षा के लिए एक भी संतरी नहीं था। हकीकत यह है कि उस वक्त पुलिसकर्मी शराब के नशे में बेसुध थे और वे चाहकर भी नक्सलियों का मुकाबला नहीं कर सके। और तो और छत्तीसगढ़ की पुलिस द्वारा की जा रही गोरिल्ला कारवाई से नक्सलियों में बहुत बड़ा भय व्याप्त था और उनके हौसलें पस्त हो रहे थे।
ज्ञात रहे कि आंध्रप्रदेश के बाद छत्तीसगढ़ ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां पूर्णरूपेण सुनियोजित ढंग से पुलिसबल को गुरिल्ला युध्द की टेनिंग दे कर नक्सलियों के गढ़ को जमींदोह किया जा रहा है। राज्य सरकार द्वारा दिये जा रहे गुरिल्ला टे्रनिंग से पुलिसबल के अंदर जो साहस देखने को मिला वे आश्चर्य चकित करने वाले थे। इससे पूर्व आंध्रप्रदेश में भी पुलिस को गुरिल्ला प्रशिक्षण की सुविधा दी गई थी, जिससे वहां की पुलिस ने नक्सलियों का खात्मा करने में काफी हद तक सफलता पाई है। आंध्रा में नक्सलियों के उपर पुलिस का दबाव इस कदर हावी था कि उन्हें मजबूर होकर प्रदेश छोड़कर भागना पड़ा। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ के नक्सलियों के मन में यह डर बैठ गया था कि अगर गोरिल्ला युध्द यहां भी जारी रहता है तो हमारे पांव यहां से भी उखड़ने में समय नहीं लगेगा। इसलिए ये नक्सली जो हिंसा कर रहे हैं वे बड़ी निराशा और हताशा में कर रहे हैं। इस हमले के पीछे नक्सलियों की मंशा यह थी कि वे इससे अपने खिलाफ चल रही पुलिसिया कार्रवाई को रूकवाने में सफल होंगे और सरकार को बातचीत के लिए मजबूर कर देंगे।
इस बात की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि देश के नक्सली आंदोलन को आतंकवादियों से हथियार और पैसे से मदद मिल रही है, क्योंकि उनके मदद के बगैर नक्सलियों के पास अत्याधुनिक हथियार नहीं आ सकते। बिडम्बना यह है कि हमेशा से आतंकवाद का पोषक रहा पाकिस्तान आज आतंकवाद को प्राणघातक मानता है। स्वयं मुशर्रफ ने भी कहा है कि आतंकवादियों को खदेड़ना पाकिस्तान के हित में होगा। लेकिन यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि अप्रैल, 2005 में भारत के संसद में केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल नक्सलियों के के बारे में बयान देते हैं कि-''हम वनवासी क्षेत्रों और जंगलों से आने वाले लड़के-लड़कियों से किस प्रकार व्यवहार करें? उनके पास रोजगार नहीं हैं। खाने को भरपेट भोजन नहीं हैं। अगर वे आवेश में आकर हथियार उठा लेते हैं तो इसमें हमारी सरकार क्या कर सकती है?'' इसका तात्पर्य यही है कि सरकार नक्सली हिंसा के कारण को जानती है, लेकिन कोई हल नहीं निकाल सकती।
हमारे देश में सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर भी जमकर राजनीति की जाती है। वोटबैंक की राजनीति के कारण पिछले लोकसभा चुनाव में आंध्रप्रदेश की स्पेशल यूनिट को बंद कर दिया गया। इससे पूर्व यह घटिया राजनीति एनटी रामाराव द्वारा 1982 में की गई थी, जब उन्होंने नक्सलियों को वास्तविक महान देशभक्त कहा था। इसी रास्ते को अख्तियार करते हुए कांग्रेस के मुख्यमंत्री एम चेन्ना रेड्डी भी 1989 में नक्सलियों को देशभक्त घोषित किया था। एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायुडू ने नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक रवैया अपनाया था तो दूसी तरफ राजशेखर रेड्डी ने नक्सलियों को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ये हमारे देश का महादुर्भाग्य नहीं तो और क्या है?
लेकिन हकीकत में नासूर बन चुकी नक्सली समस्या से निपटने के लिए आज एक ईमानदार, पारदर्शी, जनता के प्रति समर्पित और लोकतांत्रिक रणनीति चाहिए। और ये काम राजनीतिक दल अपनें अंदर तीव्र इच्छाशक्ति उत्पन्न कर बखूबी कर सकते हैं। क्योंकि नक्सली हमेशा भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाते रहते हैं। आज ये नक्सली देशी तमंचों के भरोसे अपनी जंग नहीं लड़ रहे हैं बल्कि उनके पास मौजूद आधुनिक हथियारों के जखीरे में एके- 47, राकेट लांचर, लैंड माइंस, ग्रेनेड आदि हैं। इसके अलावा उनके पास करीब पचीस हजार प्रशिक्षित सेना है।
आज परिस्थितियां अलग हैं। नक्सलियों ने अपनी रणनीति में भारी बदलाव किया है। 1990 से नक्सलियों ने अपने संगठन को अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित करना शुरू किया था। नक्सली आंदोलन में 2004 में बड़ी तब्दीली तब आई जब दो बड़े संगठन माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर यानी एमसीसी और पीपुल्स वार ग्रुप का आपस में विलय हो गया और एक नए संगठन सीपीआई माओवादी का गठन हुआ और इससे इनकी ताकत में दोगुना इजाफा हो गया। इस विलय के बाद नक्सली वारदातों में भारी वृध्दि दर्ज की गई।
अगर हम इन प्रमुख नक्सली घटनाओं को देखें तो स्थिति की भयावहता का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है: 20 नवं. 2003 को उत्तर प्रदेश में बारूदी सुरंग की चपेट में आने से एक ट्रक में बैठे 18 पुलिसकर्मी मारे गए। 4 सितंबर 2005 को छत्तीसगढ़ में एक बारूदी सुरंग बिस्फोट में 23 की मौत। 12 सितंबर 2005 को झारखंड के एक गांव में 15 लोगों की मौत। 8 अक्टूबर 2005 को झारखंड में 25 पुलिसकर्मी मारे गए। 28 फरवरी 2006 को छत्तीसगढ़ के कोटा क्षेत्र दरबागुड़ा में बारूदी सुरंग विस्फोट में 29 ग्रामीणों की मौत। 17 जुलाई 2006 को छत्तीसगढ़ के एर्राबोर राहत शिविर पर हमला, 35 की हत्या। 4 मार्च 2007 को जमशेदपुर के सांसद सुनील महतो की निर्ममता पूर्वक हत्या। 15 मार्च 2007 को पुलिस बेस कैंप पर हमला कर 55 पुलिसकर्मियों की हत्या। पूरे वर्ष 2006 में कुल 700 नक्सली वारदातें हुई और 600 मौतें।
आज केन्द्र सरकार आए दिन हो रहे नक्सली वारदातों को राज्य की समस्या बताकर पल्ला नहीं झाड़ सकती। सरकार नरम रवैया अपनाकर नक्सलियों के मनोबल को और बढ़ा रही है। एक विचार के रूप में उभरा नक्सलवाद आतंकवाद का ही एक प्रतिरूप है। यह देश की शांति, एकता और अखंडता के लिए बहुत खतरानाक साबित होगा। इसकी वकालत करना यानी एक और विभाजन को न्योता देना है। जहानाबाद जेल कांड जैसे बड़े वारदात को अंजाम देनें से पूर्व नक्सलियों ने जनमत को अपने पक्ष में कर लिया था। पिछले अनुभव यह बताते हैं कि नक्सलियों का मुकाबला करने से पूर्व उनके विरूध्द जनमत तैयार करने की रणनीति कारगर साबित हो सकती है। राज्य सरकारों को चाहिए कि वे नक्सलियों के लिए हथियार उठाने वाले नौजवानों के रोजगार का ध्यान रखें और उनके साथ हो रहे अन्याय को दूर कर सकें तो इस समस्या को जड़ से मिटाने में काफी हद तक सफलता मिल सकती है। केवल सुरक्षाबलों के सहारे इनसे निपटना मुश्किल ही नहीं असंभव है। नक्सलवाद को एक राष्ट्रीय समस्या बता राज्याें को केन्द्र से अगुवाई करने के बजाय उन्हें विकास, जनमत और चुस्त-दुरूस्त पुलिस व्यवस्था बनाना चाहिए। नहीं तो आज नक्सलियों का आतंक 92000 किलोमीटर क्षेत्र में है। अगर इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो वो दिन दूर नहीं जब यह पूरे भारत को अपनी चपेट में ले लेगा।
आज जरूरत है कि नक्सलवाद से पीड़ित राज्यों को उससे निपटने लिए केन्द्र सरकार विशेष फोर्स की सुविधा उन्हें तुरंत दे। जिन राज्यों को घने जंगलों व स्मोक के कारण नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन करनें में दिक्कत हो रही है उन्हें तुरंत हेलीकाप्टर मुहैया कराया जाए। देश की इस गंभीर समस्या का राजनीतिकरण करना बंद करना होगा। साथ ही केन्द्र सरकार द्वारा आवंटित पैसे नक्सलियों तक न पहुंचे इसके लिए कोई ठोस व कारगर उपाय तुरंत करने होंगे। क्योंकि पिछली बार 25000 करोड़ रूपया सरकार ने आवंटित किया था लेकिन जमीन तक यह नहीं पहुंच सका। ज्यादातर इसे नक्सलियों ने लेबी के रूप में ले लिया। केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकारों द्वारों अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना किसी भी तरह से न्यायोचित नहीं होगा। सरकारों का यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ी देश के नेताओं को कभी माफ नहीं करेंगी।
इतिहास गवाह है हिंसा से किसी भी
जनआंदोलन को नहीं दबाया जा सका
संतोष सिंह
इतिहास गवाह है कि किसी भी विचारधारा का विस्तार जोर जबरदस्ती से नहीं किया जा सका है और न ही हिंसा से किसी जनआंदोलन को दबाया जा सका है। छत्ताीसगढ राज्य के बस्तर क्षेत्र में भी कामोबेश स्थिति आज यही है। नक्सली अपनी विचारधारा को लोगों पर जबरन लादने का प्रयास कर रहे हैं और उनकी बात नहीं मानने पर वे तरहतरह से लोगों को परेशान कर रहे हैं, यहां तक कि नक्सलियों की बात नहीं मानने पर वे निर्दोष ग्रामीणों की हत्या कर देते हैं, फिर भी बस्तर के लोग नक्सलियों के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं, भले ही उन्हें अपनी जान की बाजी ही क्यों न लगानी पडे और इसकी परिणिति सलवा जुडूम अभियान है।
सन् 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग जिले के नक्सलबाडी गांव में शुरु हुआ सशस्त्र विद्रोह नक्सल आंदोलन कहलाया। माओत्सेसुंग़ की विचारधारा से प्रभावित नक्सलवाद के जनक चारु मजूमदार, कनु सान्याल तथा उनके साथी थे। सन् 1972 में आंध्रप्रदेश में एक घोर माओवादी नक्सली नेता कोंडापल्ली सीता रमैया का उदय हुआ। उन्होंने सशस्त्र संघर्ष पर जोर दिया। अपनी इस अलग विचारधारा को स्थापित करते हुए सीता रमैया ने सशस्त्र अतिवादियों का संगठन पीपुल्स वार गुप (पी.डब्ल्यू.जी.) बनाया। गुरिल्ला युद्ध इनका प्रमुख हथियार बना। वर्तमान में देश के 13 राज्यों के 200 से अधिक जिले नक्सल प्रभावित हैं। नक्सलवाद से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में छत्तीसगढ, झारखंड, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, उडीसा एवं बिहार शामिल हैं। छत्तीसगढ में सर्वप्रथम 1968 में बस्तर में नक्सली पर्चे वितरित होते देखे गए। घने वनों से अच्छादित बस्तर के दण्डकारण्य क्षेत्र को गुरिल्ला लडाई के उपयुक्त पाये जाने पर नक्सलियों ने यहां पैर पसारा। पहले यहां सर्वे का काम हुआ। फिर गांवग़ांव में घूमकर जनसमूह को नाचग़ाना के माध्यम से आकर्षित किया गया। दूसरे चरण में नक्सलियों ने बांस से लेकर तेंदूपत्ता आदि वनोपज की उचित मजदूरी की मांग को लेकर उन्हें अपनी ओर आकर्षित किया तथा उनका विश्वास अर्जित करने का प्रयास किया। भोलेभाले ग्रामीणों को गुमराह कर संघम सदस्य के रुप में शामिल कर नक्सली अपनी गतिविधियां बढाते रहे।
प्रारंभ में नक्सलियों की कुछ विचारधारा थी और उनके कुछ सिद्धांत थे, जिससे लोग उनकी ओर आकर्षित भी हुए, लेकिन आज नक्सली अपनी विचारधारा और सिद्धांत से भटक गये हैं। आज उनके पास कोई विचारधारा नहीं है। इसीलिए वे बस्तर के निरीह एवं निर्दोष आदिवासियों की हत्या करने से भी नहीं चूकते हैं। नक्सली इन क्षेत्रों में विकास एवं निर्माण कार्य नहीं होने देते और शासन द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधक बने हुए हैं। इतना ही नहीं बल्कि अब दक्षिण बस्तर दंतेवाडा जिले के बासागुडा, आवापल्ली एवं उसूर आदि क्षेत्रों में आदिवासियों को खेती नहीं करने देकर आदिवासियों के जीने के अधिकार का सीधासीधा हनन कर रहे हैं। नक्सली मानव अधिकारों का सीधासीधा उल्लंघन कर रहे हैं। आये दिन बेगुनाह लोगों को अगवा कर उनकी हत्या कर देते हैं। नक्सलियों ने आदिवासियों की परंपरा एवं संस्कृति को भी क्षति पहुंचाई है। बस्तर के आदिवासियों की विश्व विख्यात प्रथा घोटुल भी अब दम तोडने लगा है। नक्सलियों ने दोरनापाल राहत शिविर में रह रहे ग्रामीणों को गर्मी के दिनों में बंधक बनाकर उन्हें भूखेप्यासे रखा और प्यास बुझाने के लिए पानी के साथ मूत्र मिलाकर दिया। नक्सलियों ने एर्राबोर के राहत शिविर में रात्रि में अचानक आगजनी कर सोते हुए बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतार दिया। यहां तक कि 6 माह की बच्ची को भी आग में झोंकते समय समय उन्हें कोई तरस नहीं आया। नक्सलियों ने विशेष पुलिस अधिकारी 15 वर्षीय बालिका के साथ भी सामूहिक अनाचार कर सम्पूर्ण मानवता को कलंकित किया है।
यदि नक्सलवादी विचारधारा से बस्तर क्षेत्र का विकास होना होता तो आज दुनिया की अनोखी जनक्रांति सलवा जुडूम अभियान नहीं शुरु हुआ होता। नक्सलियों के विकास विरोधी रवैया ने आदिवासियों के मन में उनके प्रति उब पैदा कर दी और इसी उब के चलते सलवा जुडूम जैसे जनआंदोलन का जन्म हुआ। ग्रामीणों का स्वस्फूर्त आंदोलन सलवा जुडूम का पहला जनजागरण अभियान वर्ष 2005 से शुरु हुआ और 4 जून 2006 को इसकी सालगिरह मनाई गई। गोडी भाषा के शब्द सलवा जुडूम का शाब्दिक अर्थ शांति मिशन है। इस अभियान को सभी राजनीतिक दलों के लोग बगैर भेदभाव के समर्थन दे रहे हैं। यह अभियान अब तक 644 गांवों में संपन्न हो चुका है। इस अभियान से बस्तर क्षेत्र के विकास की नई आस जागी है। सलवा जुडूम अभियान को राज्य सरकार द्वारा पूर्ण सहयोग दिया जा रहा है। सलवा जुडूम अभियान का अच्छा प्रभाव आंध्रप्रदेश के वारंगल में भी पहुंचा। वहां के नक्सलियों को घर वापस बुलाने हेतु उनके परिवार के बुर्जुगों ने मार्मिक अपील की है। छत्तीसगढ में नक्सली आतंक से अपने घर बार छोड चुके 45 हजार से अधिक लोगों के लिए राज्य सरकार की ओर से 27 स्थानों पर राहत शिविर खोले गये। इन शिविरों में रहने वाले ग्रामीणों हेतु भोजन एवं चिकित्सा आदि की व्यवस्था की गई। इनके पुनर्वास के लिए 36 करोड रुपये का विशेष पैकेज दिया गया। 8 करोड 81 लाख रुपये की लागत से 6 हजार से अधिक रोजगारमूलक कार्य शुरु कराये गये। ग्रामीण परिवारों को 853 बैल जोडी दी गई। राहत शिविरों में रहने वालों को स्थायी आवास उपलब्ध कराने 24 स्थानों पर 4535 आवास गृहों का निर्माण कराया जा रहा है। 3801 किसानों को 1998 क्वींटल धान बीज नि:शुल्क दी गई और 136 किसानों की 260 एकड जमीन की ट्रेक्टर से नि:शुल्क जुताई की गई।
नक्सलियों के बारे में पहले बात करने से भी लोग डरते थे, लेकिन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा सत्ता की बागडोर सम्हालते ही नक्सली समस्या को गंभीरता से लिया गया। उन्होंने केन्द्र सरकार के सामने भी इस समस्या को केवल कानून व्यवस्था की समस्या न मानकर एक राष्ट्रीय समस्या मानने के संबंध में अपना पक्ष बडी मजबूती से रखा। राज्य सरकार द्वारा नक्सली समस्या से निपटने के लिए सुरक्षा के साथ ही विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सरगुजा एवं उत्तार क्षेत्र तथा बस्तर और दक्षिण क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरणों की स्थापना कर इनके माध्यम से जनप्रतिनिधियों के सुझावों के अनुरुप करोडों रुपयों के निर्माण कार्य कराये जा रहे हैं। आत्म समर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए राज्य सरकार द्वारा आकर्षक पुनर्वास पैकेज घोषित किये गये हैं। छत्तीसगढ में इनामी नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए आंध्रप्रदेश की तर्ज पर आत्म समर्पण करने पर उनकी गिरफ्तारी के लिए घोषित इनाम भी उन्हें दिये जाने पर विचार किया जा रहा है। नक्सली घटना में मृत्यु होने पर प्रभावित परिवार के आश्रित को एक लाख रुपये की राहत, प्रत्येक मृत के परिवार के एक सदस्य को शासकीय नौकरी, हाऊसिंग बोर्ड की ओर से एक लाख रुपये तक के मकान, घायल व्यक्ति (असमर्थता) को 50 हजार रुपये, गंभीर रुप से घायल को 10 हजार रुपये, कच्चे मकान के नुकसान पर 10 हजार रुपये, पक्के मकान के नुकसान पर 20 हजार रुपये, चल संपत्ति (अनाज, कपडा, घरेलू सामान) के नुकसान पर 5 हजार रुपये, आजीविका के साधन (बैलगाडी, नाव) के नुकसान पर 10 हजार रुपये और जीप, ट्रेक्टर के नुकसान पर 25 हजार रुपये राहत राशि दी जाती है। अब तक 268 शहीद ग्रामीणों के परिवारजनों को 310 लाख रुपये की सहायता प्रदान की गई। इसके साथ ही 296 घायल ग्रामीणों को 37 लाख 83 हजार रुपये, 282 क्षतिग्रस्त मकानों के लिए 62 लाख 33 हजार रुपये, संपत्तिा हानि के 429 प्रकरणों में 10 लाख 25 हजार रुपये और 924 आत्म समर्पित संघम सदस्यों को 40 लाख 20 हजार रुपये की सहायता दी गई है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बल तैनात कर पडोसी राज्यों के पुलिस अधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित कर नक्सली उन्मूलन अभियान चलाया जा रहा है। इस नक्सली उन्मूलन अभियान के अच्छे परिणाम आये हैं, जिसमें गढचिरौली डिविजनल कमेटी का सर्वोच्च कमांडर विकास, कुख्यात नक्सली सब जोनल कमांडर रमेश नगेशिया, झारखंड के जोनल कमांडर मानस, दुर्दांत नक्सली जोनल कमांडर नारायण खैरवार सहित अनेक कुख्यात नक्सली मारे गये और गिरफ्तार किये गये। छत्तीसगढ में शुरु किये गये नक्सली उन्मूलन अभियान से प्रभावित होकर निकटवर्ती राज्य महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, उडीसा एवं झारखंड में भी यह अभियान चलाया जा रहा है। छत्तीसगढ में नक्सली उन्मूलन अभियान को अच्छी सफलता मिल रही है। वर्ष 2003 में जहां 10 नक्सली मारे गये थे, वहीं 2004 में 13 नक्सली, 2005 में 27 नक्सली और 2006 में अब तक 50 नक्सली मारे गये हैं। नक्सली मुठभेडों में भी बढोत्तारी हुई है। वर्ष 2003 में जहां 81 मुठभेड हुई थी, वहीं 2004 में 162 मुठभेड, 2005 में 198 मुठभेड एवं 2006 में अब तक 263 मुठभेडें हुई है। नक्सलियों की गिरफ्तारी भी बढी है। वर्ष 2003 में जहां 12 नक्सली गिरफ्तार किये गये थे, वहीं 2004 में 50 नक्सली, 2005 में 128 नक्सली एवं 2006 में अब तक 51 नक्सली गिरफ्तार किये गये हैं । साथ ही 2003 में 93 संघम सदस्य गिरफ्तार किये गये थे, वहीं 2004 में 411 संघम सदस्य, वर्ष 2005 में 395 एवं 2006 में अब तक 168 संघम सदस्य गिरफ्तार किये गये हैं। आत्म समर्पण करने वाले नक्सलियों और संघम सदस्यों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। वर्ष 2003 में जहां 37 नक्सली संघम सदस्यों ने आत्म समर्पण किया था, वहीं वर्ष 2005 में 1415 और 2006 में अब तक 1261 नक्सली एवं संघम सदस्यों ने आत्म समर्पण किया है। इसके अलावा नक्सलियों के कई कैम्प ध्वस्त किये गये और उनके पास से लैण्डमाइन, हथियार, हेण्डग्रेनेड, रॉकेट लांचर, मोर्टार, वायरलेस सेट, मोटर सायकल और दैनिक उपयोगी की सामग्री बरामद की गई।
राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा के साथ ही विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आवागमन के साधन विकसित करने के उद्देश्य से साढे चार करोड रुपये से अधिक लागत की सडकों और पुलपुलियों का निर्माण पुलिस अभिरक्षा में युद्ध स्तर पर कराये जा रहे हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नक्सलियों के भय के चलते टेंडर भरने के लिए ठेकेदार सामने नहीं आ रहे थे। इस समस्या की ओर सरकार का ध्यान जाने पर नक्सली क्षेत्र में पीस वर्क पद्धति से कार्य कराने की अनुमति दी गई और कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों से कहा गया कि वे अपने क्षेत्रों में निर्माण कार्यों पर भी विशेष ध्यान देवें तथा जहां जरुरत हो वहां निर्माण कार्य कराने के लिए पुलिस बल भी उपलब्ध करायें। राज्य शासन के इस फैसले से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के निर्माण कार्यों में भी गति आई है।
राज्य सरकार द्वारा नक्सली उन्मूलन अभियान के तहत हथियार लाओ इनाम पाओ अभियान चलाया जा रहा है। हथियार सहित आत्म समर्पण करने वाले नक्सलियों को एल.एम.जी. हेतु 3 लाख रुपये, ए.के. 47 हेतु 2 लाख रुपये, एस.एस.आर. हेतु 1 लाख रुपये, थ्री नॉट थ्री रायफल हेतु 50 हजार रुपये, 12 बोर बंदूक हेतु 20 हजार रुपये दिया जाता है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पदस्थ पुलिस जवानों और सुरक्षा बलों के लिए 10 लाख रुपये का बीमा कराया गया है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अदम्य साहस का परिचय देने वाले जवानों को क्रम पूर्व पदोन्नति भी दी जाती है और इस वर्ष अब तक 104 जवानों को इसका लाभ मिला है।
सुरक्षा बल के जवान नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शांति स्थापित करने के लिए रातदिन लगातार प्रयास कर रहे हैं, लेकिन नक्सली आतंक के विरुद्ध आज वैचारिक क्रांति लाने की जरुरत है। कुछ स्वयं सेवी संगठनों ने जरुर नक्सलियों के आतंक के खिलाफ आवाज उठाई है। छत्तीसगढ के हर नागरिक को चाहिए कि वह नक्सली समस्या को केवल बस्तर के लोगों की समस्या न माने, बल्कि अपनी समस्या मानकर उसके निदान के लिए हर स्तर पर यथा संभव सहयोग करे। इतिहास साक्षी है कि हिंसा से किसी भी जनआंदोलन को नहीं दबाया जा सका है। जलियावाला बाग में कितनी गोलियां चली, लाशों के ढेर लग गये परन्तु स्वतंत्रता आंदोलन को नहीं दबाचा जा सका और अंत में भारत स्वतंत्र हुआ तथा अंग्रेजों को भारत छोडकर जाना पडा। उसी तरह बस्तर के आदिवासियों द्वारा नक्सलियों के खिलाफ शुरु किया गया सलवा जुडूम अभियान को भी नक्सली हिंसा से नहीं दबाया जा सकता है। नक्सली आतंक से सलवा जुडूम अभियान बंद होने वाला नहीं है और उम्मीद है कि एक न एक दिन बस्तर में जरुर शांति स्थापित होगी तथा नक्सलियों को बस्तर छोडकर जाना पडेगा।
इन आदिवासियों का कसूर क्या है ?

दिनॉक 23.05.07 को ND TV नई दिल्ली से कुछ पत्रकार आए। उन्होने हिमांशु कुमार जी, संचालक वनवासी चेतना आश्रम, कंवलनार दन्तेवाड़ा (स्वयं सेवी संस्था) एवं मुझसे वर्तमान में नक्सलवाद एवं सलवा जुडुम के कारण ग्रामीण आदिवासियों के बीच में पैदा हो रही दिक्कतों के विषय में जानना चाहा। इस पर हम लोगों ने उन्हे ग्रामीण आदिवासियों की दिक्कतों के विषय में जानने हेतु कुछ शिविरों एवं ग्रामों में लोगों से भेंट करने की सलाह दी। इस पर उन्होने दो दलों का निर्माण किया। एक दल शिविरों में लोगों से भेंट करने के लिए एवं दूसरा दल ग्रामो में लोगों से भेंट करने के लिए। शिविरों में लोगों से भेंट करने वाला दल दोरनापाल, कोंटा, ऐर्राबोर गया। अब सवाल यह था कि ग्रामों में लोगों से भेंट करने वाले दल को कहॉ ले जाया जाए। उसी वक्त मुझे ख्याल आया कि मुझे यूनीसेफ, छत्तीसगढ़ द्वारा ग्रामों में रह रहे लोगों की, विशेषकर महिलाओं एवं बच्चों की स्थिति की जानकारी प्राप्त करने के लिए इन्द्रावती नदी के पार जाना है। अत: ग्रामों का भेंट करने वाले दल की ज़िम्मेदारी मैंने ले ली। ND TV के इस दल को हमने पुलिस अधीक्षक दक्षिण बस्तर, दन्तेवाड़ा से भेंट कर इस बात की जानकारी देने को कहा कि वे इन्द्रावती नदी के पार के गॉवों में जाकर वहॉ पर रह रहे लोगों की स्थिति का जायजा लेना चाहते हैं। इस पर उन्होने बांगापाल के थाना प्रभारी को इसकी जानकारी देते हुए कहा की उन्हे नदी पार जाने दिया जाए। हम लोग दूसरे दिन अर्थात् 24.05.07 को सुबह 5:30 बजे दन्तेवाड़ा से निकले और सुबह 7:00 बजे हमने इन्द्रावती नदी को पार किया। इस दौरान हमने गौर किया कि कुछ सहमी हुई ऑखें हमें देख रही हैं। इस दल में ND TV से आए हुए साथी श्री सुधीर रंजन सेन एवं कैमरा मेन श्री दिवाकर तथा कोपाराम कुंजाम एवं मैं स्वयं थे।
ग्राम भेंट का प्रतिवेदन (ग्रामीणों की स्थिति एवं उनके वक्तव्य):-जब हम इन्द्रावती के नदी के किनारे लगा हुआ गॉव चिन्गेर पहुंचे तो हमने देखा कि कुछ छोटे-छोटे बच्चे एवं महिलाऍ आम पेड़ों के नीचे एकत्र होकर आम बिन रही हैं। जब हम उनके पास पहुंचने लगे तो उन्होने हमें देख लिया एवं जंगल की तरफ भागने लगे। हमने स्थानीय बोली में उनसे पुकार कर कहा कि रूक जाइये, हम आपसे कुछ नहीं कहेंगे। इस पर भी वे नहीं रूके। हमने खाली पड़े हुए घरों में जाकर यह पता लगाने की कोशिश की कि शायद कोई व्यक्ति मिल जाए। हमारे प्रयास से हमें एक घर में दो व्ध्द पुरूष एवं एक वृध्द महिला मिल गई, वे गंभीर रूप से बीमार थे। हमने देखा कि एक हाथ एवं अण्डकोष में बुरी तरह से खुजली हो गई, साथ ही उसके हाथ एवं पैरों में फोड़े हो गये हैं, जिससे वह चल फिर पाने में भी असक्षम है। उसने हम लोगों को बताया कि पिछले छह महीने वह इस गंभीर स्थिति से गुजर रहा है। दूसरे व्यक्ति ने बताया की उसे भी भयंकर खुजली हो गई है एवं वह इसके कारण से चल फिर नहीं सक रहा है। उन लोगों से भोजन हेतु सामग्री की उपलब्धता के बारे में पूछा तो उन्होने बताया कि उनके पास अनाज नहीं है, वर्तमान में वे आसपास के जंगल-झाड़ियों से प्राप्त कंदमूल एवं अन्य प्रकार के फलों का सेवन कर अपने जान की रक्षा किये हुए हैं। जब उनसे पूछा गया कि वे राशन एवं नमक तेल इत्यादि लेने तुमनार बाज़ार क्यों नहीं जाते हैं, इस पर उन्होने बताया कि ''हम इन सामग्रियों को लेने जाना तो चाहते हैं, परन्तु नेलसनार एवं कासोली शिविरों में वास कर रहे हमारे एवं आसपास के ग्रामों के निवासी नदी पार नहीं करने देते हैं एवं यदि कोई इस प्रकार का प्रयास करता है तो उसे पीट-पीटकर बेदम कर दिया जाता है और शिविर में ले जाकर पटक दिया जाता है व उसे वापस आने नहीं दिया जाता है। कभी-कभी उनका कत्ल भी कर दिया जाता है। ऐसे अनेक कत्ल सलवा जुडुम, विशेष पुलिस अधिकारी एवं सुरक्षा कर्मियों के द्वारा किये गये हैं।'' जब हमने उन वृध्दों से जंगल की ओर भाग खड़े हुए औरतों एवं बच्चों के विषय में पूछा तो बताया कि वे कासोली शिविर से वापस भाग कर आए हुए हैं एवं नदी पार से कोई भी व्यक्ति आता है तो हम सभी भाग खड़े होते हैं, क्योंकि वह सलवा जुडुम या सुरक्षा कर्मियों से संबंधित हो सकता है और यदि कोई भी व्यक्ति उन लोगों के हाथ में आता है तो वे उसकी बुरी तरह से पिटाई करते हैं एवं शिविर में लेकर चले जाते हैं। वे सभी अब शिविर में वापस नहीं जाना चाहते हैं, इसीलिए डरकर भाग जाते हैं।
इसके पश्चात् हम लोग आगे बढ़कर ऐहकेली ग्राम पहुंचे वहॉ पर हमें एक अंधे के अलावा कोई नहीं मिला। हमारे पास समय की कमी थी, इसी वज़ह से हम लोग तेजी से चलते हुए ओड़सा नामक ग्राम पहुंचे । वहॉ पर हमें बहुत से लोग मिले वे काफी डरे हुए थे, परन्तु हमने उन्हे अपने आने का उद्देश्य बताया तो वे कुछ सामान्य हुए। फिर उन्होने अपनी बात हमारे सामने रखी। उसमें से एक-दो लोग मेरे पूर्व परिचय के भी मिले। महिलाओं ने बताया कि उनके पास खाने-पीने का सामान नहीं है, उनके बच्चे बीमार हो जाते हैं तो उन्हे दवाई नहीं मिल पाती है और वे मर जाते हैं, ग्रामीणों ने बताया कि ग्राम निराम में काफी सारे लोग रहते हैं और हमें उनके पास जाना चाहिए और वहॉ पर सारी तकलीफों के विषय में आसानी से चर्चा की जा सकेगी। इस पर हम लोग पैदल चलते हुए वहॉ पर पहॅुचे, वहॉ पर काफी सारे लोग हमें पहले से ही बैठे हुए मिले। लोगों ने बड़े ही आदर से हम चारों को बैठाया। हमने उनसे शासन द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं के विषय में पूछा तो उन्होने बताया कि यहॉ पर पिछले तीन वर्षों से किसी भी प्रकार की शासकीय सुविधाऍ शासन द्वारा नहीं प्रदान की जा रही हैं। तीन वर्ष पूर्व तक यहॉ पर स्कूल एवं ऑगनबाड़ी केंद्र चला करते थे, परन्तु वे भी नियमित नहीं चलते थे। इसी प्रकार स्वास्थ्य कार्यकर्ता भी कभी-कभी आ जाया करते थे, इससे कम से कम हमें एवं हमारे बच्चों को थोड़ी बहुत राहत मिल जाया करती थी। परन्तु वर्तमान में सलवा जुडुम के शुरू होते ही ये सारी सुविधाऍ शासन द्वारा बंद कर दी गई हैं। ग्रामीण कहते हैं कि उनकी समझ में नहीं आया कि ये सारी सुविधाऍ शासन द्वारा क्यों बंद कर दी गई हैं, जबकि इन कार्यक्रमों के संचालन में कभी भी किसी के द्वारा कोई आपत्ति दर्ज नहीं की गई है। इन ग्रामों में रह रहे ग्रामीणों का कहना है कि जब सलवा जुडुम शुरू हुआ था, उस समय ज़ोर ज़बरदस्ती करके चिन्गेर, ऐहकेली, सतवा, बांगोली इत्यादि ग्रामों के समस्त ग्रामीणों को सलवा जुडुम के नेताओं एवं फोर्स द्वारा ले जाया गया, परन्तु हमने सोचा कि यदि यहॉ से वहॉ चले गये तो फिर हम न तो खेती-बाड़ी कर सकेंगे और न ही वनोपज संग्रहण कर सकेंगे, जोकि हमारे जीवन-यापन के मूल साधन हैं। इससे हम सभी वहॉ भूखों मर जाऍगे । ग्रामीणों ने इस बात का वक्तव्य दिया है कि उनके जीवन निर्वहन के लिए अनाज, नमक, तेल, मिर्च, कपड़ा इत्यादि साधनों को ठोठा है, क्योंकि यदि वे नदी पार करके गीदम या तुमनार बाजार जाते हैं, तो उन्हे सलवा जुडुम के सदस्यों एवं फोर्स द्वारा पकड़कर बुरी तरह पीटा जाता है और शिविर में ले जाकर फेंक दिया जाता है या फिर कत्ल कर दिया जाता है, इसीलिए वे बाज़ार जाते ही नहीं हैं। यदि उन्हे जीवन निर्वहन के इन साधनों की आवश्यकता पड़ती है तो एक अन्य बाजार जोकि 80 किमी. दूर है, वहॉ पैदल जाते हैं, इसमें उन्हे अपने तीन दिन गॅवाने पड़ते हैं।
ग्रामीणों का यह भी कहना था कि सलवा जुडुम के चलते घरेलू परिवारों के बीच खाई पैदा हो गई है, आज की स्थिति में भाई-भाई को नहीं पहचानता, वे एक दूसरे को शत्रु के दृष्टिकोण से देखते हैं। हमारे सारे सांस्कृतिक व्यवस्थाऍ, परंपराऍ, तीज-त्यौहार बंद हो गये हैं और इससे आदिवासियों की वर्षों से संचित एवं पोषित सांस्कृतिक विरासत को गहरा आघात पहुंचा है। ग्रामीणों के अनुसार अब न तो उनके ग्रामों मेला होता है और न ही कोई त्यौहार। उन्होने बताया कि पिछले तीन सालों में इस क्षेत्र के 30 से भी अधिक ग्रामों में भयवश कोई शादी नहीं हुई।
ग्रामीणों ने यह भी बताया कि सलवा जुडुम के सदस्य, विशेष पुलिस अधिकारी, जिनमें से अधिकतर भूतपूर्व संघम सदस्य हैं, केंद्रीय रिज़र्व फोर्स तथा पुलिस के लोग समय-समय पर आते हैं और कुछ लोगों को जान से मार डालते हैं एवं कुछ को पकड़ कर ले जाते हैं, हमें अपनी जान बचाकर जंगल में भाग जाना पड़ता है, इन लोगों के द्वारा जवान लड़कियों के साथ बलात्कार के भी अनेक उदाहरण हैं। हाल ही में ओड़सा ग्राम के एक लड़की के साथ भी इनके द्वारा बलात्कार किया गया है। इसके अलावा जब ये लो गॉवों में आते हैं और यदि कोई छोटा बच्चा मिल जाता है तो उसे पैर से पकड़कर जमीन पर पटककर मार डाला जाता है।
ग्राम भेंटकर्ता का अभिमत:- जब मै, कोपाराम कुंजाम एवं मेरे अन्य दो साथी जोकि ND TV नई दिल्ली से आए हुए थे, ने जाकर ग्रामीणों से भेंट किया एवं उनसे विभिन्न विषयों पर चर्चा किया तो यह बात खुलकर आई कि लोग वर्तमान परिस्थितियों में अत्यंत दुखी हैं एवं गंभीर रोगों के शिकार हैं। जिस तरह से वे जी रहे हैं, उससे बेहतर तो जानवरों की जिन्दगी है। उनके पहनने के कपड़े चीथड़े हो गये हैं, उनके पास खाने को अनाज, दाल, नमक, तेल, हल्दी, मिर्च इत्यादि सामग्रियों का पूर्णाभाव है। सुरक्षाकर्मी एवं सलवा जुडुम के सदस्य समय-समय पर इन ग्रामों में नक्सली उन्मूलन ऑपरेशन के नाम पर जाते हैं और मासूम ग्रामीण आदिवासियों की हत्या कर देते हैं, जवान बालिकाओं एवं महिलाओं के साथ दर्ुव्यवहार करते हैं एवं उनके बच्चों को जान से मार डालने की घटनाओं को अंजाम देते हैं। लोगों को खुजली, मलेरिया एवं अन्य प्रकार की गंभीर बीमारियों ने घेर लिया है और उनके इलाज के लिए उनके पास किसी प्रकार की व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा उन्हे किसी भी प्रकार की मूलभूत सुविधा प्रदान नहीं की गई है, लोग जंगल से कंदमूल एवं मौसम फल लाकर किसी तरह अपने जीवन को बचाये हुए हैं, उनके पास पीने के पानी का भी नितांत अभाव है, वे गंदे डबरों का पानी पीने और नहाने के लिए उपयोग कर रहे हैं, इससे भी अनेक बीमारियॉ उनमें फैली हुई हैं, जिससे वे असमय मृत्यु के गाल में समाते जा रहे हैं, इससे आदिवासियों की जनसंख्या में लगातार कमी आ रही है।
मेरे देखे से जो चीज़ मेरी समझ में आई वह यह कि लोगों को सलवा जुडुम में जुड़कर कार्य न करने की सजा उन्हे शासन समर्थित सलवा जुडुम एवं सुरक्षाकर्मियों के द्वारा उनकी जीने की मौलिक स्वतंत्रता छीन कर दी गई है। प्रत्येक व्यक्ति को अपना रहने, जीने, कार्य करने की स्वतंत्रता हमारे संविधान द्वारा दी गई है और प्रत्येक व्यक्ति जहॉ चाहे वहॉ रह सकता है, अपना मनपसंद कार्य चुन सकता है। सलवा जुडुम के सदस्यों एवं सुरक्षाकर्मियों के द्वारा जिस तरह से मासूम आदिवासियों का रसद रोका गया है, उनका कत्ल किया जा रहा है, इससे ऐसा प्रतीत होता है, जैसे कि अब इस देश में संविधान नामक की कोई चीज़ ही नहीं बची। ऐसा व्यवहार दो दुश्मन देशों के बीच में भी नहीं होता हैं। दुश्मनी की भी कुछ मर्यादाएॅ होती हैं, परन्तु यहॉ पर दुश्मनी नहीं दिखती, वरन् ऐसा लगता है, जैसे कि मनुष्यों के द्वारा जंगली जानवरों का शिकार किया जा रहा है। उपरोक्त समस्त घटनाएॅ जिला प्रशासन की देखरेख व सहयोग से हो रही हैं। प्रशासन का यह चेहरा शायद ऐतिहासिक ही होगा कि वह जनता और जनता के बीच फर्क करते हुए कार्य कर रही है और इसे राज्य शासन की शाबाशी प्राप्त है।
जब हम लोग इन ग्रामों के ग्रामीणों से चर्चा कर रहे थे, वे बड़ी ही आशा भरी नज़रों से हमें देखते हुए अपनी तकलीफों का हिसाब दे रहे थे। मुझे लगता है कि अगर मैं अपने घर में रहकर अपना दैनिक जीवन जीना चाहता हूँ, तो यह कोई अपराध नहीं है। इसके लिए मेरा हुक्का-पानी बन्द नहीं किया जा सकता।
उपरोक्त परिस्थितियों के संबंध में मेरा कथन है कि एक तरफ तो हम सभ्य समाज के लोग इन आदिवासियों को अपने पक्ष में करने के पक्षधर हैं और दूसरी तरफ हम उनके साथ एक आम मानव के समान भी व्यवहार नहीं करते, साथ ही उन्हे संविधान प्रदत्त अधिकारों से महरूम कर देते हैं, उन पर जान लेवा हमला करते हैं, उनकी बहू-बेटियों की अस्मत लूटते हैं और उनसे कहते हैं कि ''आइये हम मिलकर नक्सलवाद का सामना करें''। एक तरफ तो हम उनके साथ जानवरों से बद्तर सलूक करते हैं और दूसरी तरफ उनसे हमारा अनुगमन करने की अपेक्षा रखते हैं। क्या हम स्वयं से यह सवाल पूछेंगे कि ''यदि हमारे साथ कोई इस प्रकार का अमानवीय बर्ताव करे तो क्या हम किसी भी परिस्थिति में उसका साथ देने को तैयार हो पाऍगे ?'' शायद प्रत्येक व्यक्ति का जवाब ना में ही होगा, जिसमें थोड़ी बहुत भी सोच सकने की क्षमता ने सिर उठाया है।
इसके अलावा एक तथ्य पर और भी सांख्यिकीय ऑकड़ों की जानकारी बढ़ाने के लिए हमें सोचनी चाहिए। वह यह कि जिला प्रशासन के अनुसार उसने 644 ग्रामों के लगभग 50 हज़ार लोगों को शिविरों में बसाया है। अविभाजित दक्षिण बस्तर, दन्तेवाड़ा में लगभग 1300 ग्राम होते हैं और इन ग्रामो की आबादी लगभग 7 लाख बैठती है। उपरोक्त 644 ग्राम लगभग जिले के आधे ग्राम हैं, जिनकी आबादी भी लगभग जिले के आबादी की आधी होनी चाहिए, परन्तु शिविरों की आबादी लगभग 50 हज़ार है। इससे कुछ सवाल उठते हैं, जिन पर समस्त बुध्दिजीवियों को गंभीरतापूर्वक सोच लेना चाहिए। क्या 644 ग्रामों की आबादी मात्र 50 हज़ार है ?, जिन्हे कि शासन ने शिविरों में बसाया हुआ है। यदि नही तो क्या शासन ने कभी इस बात पर विचार किया कि शेष आबादी का क्या हो रहा है या यह आबादी कहॉ रह रही है ? यदि नही ंतो क्यों ? उपरोक्त प्रश्नों की छानबीन के साथ प्रत्येक लोकतांत्रिक व्यवस्था के समर्थक को इन ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान हेतु खड़ा होना चाहिए और तब कहीं इन नि:स्वर लोगों को इनका सुर मिलना संभव हो पायेगा, अन्यथा ये तो वैसे ही कुछ सालों के और मेहमान हैं।

लिंगू मरकाम
ग्राम भेंटकर्ता एवं प्रतिवेदक
दिनॉक 24.05.07 स्थान: कंवलनार, दन्तेवाड़ा
(Thanks for cgnet.in)

Monday, June 4, 2007

असम में उल्फा का तांडव आखिर कब तक चलेगा
राजीव कुमार
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असम में पिछले 6 जनवरी को यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम(ंउल्फा) द्वारा जो भयावह हिंसा का खेल खेला गया, जिसमें इस उग्रवादी संगठन ने करीब सत्तर निर्दोष मजदूरों के उपर ताबड़तोड़ गोलियां वर्षाकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया । इनमें मारे गए ज्यादातर मजदूर चाय बगानों में , ईंट-भट्ठों में काम करने वाले, दूध और मछली बेंचने वाले या दिहाड़ी मजदूरी का काम करते थे। पीढ़ी-दर पीढ़ी असम मे मजदूरी करने के वजह से इन्होंन असम में ही अपना आसियाना बनाना पड़ा।

एक ओर भारत के प्रधानमंत्री व गृहमंत्री प्रवासी भारतीयों को निवेश की आस में उनकी सुरक्षा की पूरी गारंटी दे रहे हैं वहीं दूसरी तरफ उनके इस देश के नागरिक खुद ही सुरक्षित नहीें हैं। हिन्दी भाषी प्रवासी मजदूरों की निर्मम हत्या जैसी घटनाओं को अंजाम देना उल्फा के लिए कोई नयी बात नहीं है। इससे पहले भी उल्फा ने राज्य में करीब हजारों बेगुनाह गरीब हिन्दी भाषी मजदूरों को क्रूरता पूर्वक मार डाला है। उल्फा का कहना है कि विदेशी घुसपैठियाें से असम को उतना खतरा नहीं है जितना कि भारत के अन्य राज्यों से आए हुए हिंदी भाषी लोगों से है। वैसे असम में हिंसा का दौर कई दशकों से चला आ रहा है। एक इंटरनेट सर्वेक्षण्ा के मुताबिक 1992 से 17 जनवरी, 2007 तक 6260 लोग असम हिंसा की भेंट चढ़ चुके हैं।

जिसमें 3334 आमलोग, 724 सुरक्षाकर्मी और 2202 आतंकवादी हैं। अगर पिछले पन्द्रह वर्षों के आंकड़ों पर नजर डाले तो स्थिति और भयावह हो जाती है :

Casualties of Terrorist Violence in Assam


* आंकड़े जनवरी 17, 2007 तक Source : satp.org

उल्फा राज्य में गैर असामियों का हिंसक तरीकों से विरोध करती रही है। लेकिन एक विचारणीय व गंभीर प्रश्न है कि संप्रभु असम की मांग करने वाला उल्फा एक तरफ अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने वाले हिन्दी भाषियों का विरोध करता है और दूसरी तरफ बांग्लादेशी घुसपैठियों के प्रश्न पर न केवल मौन रहता है बल्कि उसे जायज भी ठहराता है। ऐसा क्यों? इससे पूर्व उल्फा को पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए 2003 के दिसंबर में भाजपा सरकार ने भूटान सरकार की सहायता से उल्फा के सारे आतंकवादी ट्रेनिंग कैम्पों को नष्ट करनें में काफी हद तक सफलता हासिल कर ली थी जिसके परिणामस्वरूप उल्फा समाप्ति के कगार पर पहुंच गई थी। परन्तु भाजपा सरकार के बाद कांग्रेस सरकार आई तो उसने उस क्षेत्र में चुनाव में बहुमत हासिल करने के लिए उल्फा से समझौता कर लिया। समझौते के बाद कांग्रेस ने बिना किसी शर्त के सीज फायर की घोषणा कर दी। इस समझौते से उल्फा का दुस्साहस सातवें आसमान पर चढ़ गया। उसे यह आभास हो गया कि वो कुछ भी करे, उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी।

जिस उल्फा का निर्माण विदेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने के उद्देश्य से हुआ था, आज वही उल्फा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई व बांग्लादेश के खुफिया एजेंसी के हाथों का एक मोहरा बनकर रह गया है। पिछले दिनों असम में 70 मजदूरों की हत्या के पीछे इन्हीं दोनों खुफिया एजेंसियों का दबाव था। इस समय उल्फा के कई आतंकवादी प्रशिक्षण केन्द्र बांग्लादेश में चल रहे हैं, जिसका भरपूर फायदा उल्फा उठा रहा है। सन् 2005 के एक आंकड़े के अनुसार असम में उल्फा के करीब तीस से अधिक शिविर हैं। ये शिविर भारतीय भू-भाग में सीमा के नजदीक स्थित हैं, और इन शिविरों में मौजूद उल्फा कैडर सुरक्षाबलों की कारवाई के दौरान म्यांमार व बांग्लादेश भाग जाते हैं।

अत्याधुनिक हथियारों से लैस उल्फा के हजारों कैडर राज्य में हिंसक घटनाओं को अंजाम देनें के लिए सक्रिय रहते हैं। एकतरफ उल्फा शांति वार्ता का श्वांग रचती है तो दूसरी तरफ उल्फा के कैडर असम के अंदर गांव-गांव जाकर सरकार के खिलाफ लोगों के दिलों-दिमाग में जहर घोलते रहते हैं। इतना ही नहीं उल्फा द्वारा राज्य में जमकर धन की उगाही की जाती रही है। यह उगाही व्यवशायियों, फैक्ट्री मालिकों के अलावा उन सरकारी कंपनियों से की जा रही है जिनका व्यापार उत्तर - पूर्व राज्यों में फैला है। यहां तैनात सुरक्षाबलों ने जब-जब उल्फा की कमर तोड़ी है तब-तब उल्फा शांति वार्ताओं का दौर चलाता है। अगर देखा जाय तो यह शांति-वार्ता मृतप्राय हो चुकी उल्फा के लिए एक संजीवनी बूटी का काम करती है। शांतिवार्ता के नाम पर जहां उल्फा नेता अपने संगठन को मजबूत करते हुए हृदय विदारक घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं तो वहीं केंद्र सरकार घटनाओं से अनजान वोट बैंक के चलते मूकदर्शक बनी रहती है। वैसे जब-जब सुरक्षाबल उल्फा कैडरों के प्रति सख्त रवैया अपनाते हैं तब-तब उल्फा व उसके समर्थक गुट वार्ता की दुहाई देनें लगते हैं। खुद की खाल बचाने के लिए उल्फा शांति वार्ता करने में ही अपनी भलाई समझती है। इसके लिए वे कभी इंदिरा गोस्वामी को आगे करते हैं तो कभी किसी गैर सरकारी संगठन को।

सुरक्षाबलों की कार्रवाई रूकवाने या व वार्ता शुरू होने के कुछ समय बाद ही उल्फा फिर अपने पुराने खूनी रास्ते पर लौट आती है। फिर उसके तांडव का शुरू हुआ सिलसिला अब तक जारी है। सुरक्षाकर्मियों के अनुसार पिछले शांति वार्ता शुरू होने के बाद उल्फा ने राज्य में जमकर उगाही की, और अपने को सुसंगठित किया। जिसमें उसने कम से कम पचास करांड़ की रकम वसूली थी। उल्फा के नेता उत्तार-पूर्व में सक्रिय अपने कैडरों के माध्यम से धन उगाही के साथ ही हथियार, गोला-बारूद व मादक द्रव्यों के व्यापार में लगे हैं। साथ ही उल्फा बांग्लादेशी घुसपैठियों को घुसपैठ कराने व संरक्षण प्रदान करने में हरसंभव मददगार है।

दरसल घुसपैठ को सही मायने में देखा जाय, तो यह कांग्रेस सरकार के वोटबैंक की गलत नीतियों व उसके धूर्तता का ही दुष्परिणाम है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों का असंवैधानिक तौर पर आज भी घुसपैठ जारी है। सत्तारूढ़ सरकार ने वोट बैंक पॉलिसी के मद्देनजर ऐसी नीतियां व कानून बनाई जिसके चलते बांग्लादेशी घुसपैठियों का निकालना असंभव हो गया। माननीय उच्चतम न्यायालय ने 15 जुलाई 2005 में अवैध घुसपैठ से जुड़ी आईएमडीटी एक्ट को असंवैधानिक ठहराया। लेकिन केन्द्र के सर पर जूं तक नहीं रेंगी। उसने वोट बैंक की चिंता करते हुए फॉरनर्स एक्ट में ऐसे बदलाव किये जिससे उसमें आईएमडीटी एक्ट की सारी चीजें आ गई। जिससे यह स्पष्ट हो गया कि वर्तमान की केन्द्र सरकार वोट के लिए देश के भविष्य को भी दांव पर लगा सकती है । घुसपैठ को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट नें दिसम्बर 2006 के फैसले में कहा कि फॉरनर्स एक्ट के तहत नई व्यवस्था चार महीने के भीतर बनाई जाय पर कांग्रेस सरकार सब कुछ जानते हुए भी स्थिति से बिल्कुल अनजान सी बनी हुई है।

उल्फा विदेशों में बैठे अपने आकाओं के आदेशानुसार असम में बांग्लादेशी मुसलमानों को बढ़ाने के साथ-साथ उसे विस्तारित करने की रणनीति को बड़े साफगोई से अंजाम दे रही है। इसमें बांग्लादेश की सोची समझी चाल काम कर रही है। उसके इस चाल में हिन्दी भाषियों,गरीबों और, मजदूरों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। आज स्थिति यह है कि, असम में बांग्लादेशियों की संख्या इतनी ज्यादा हो गई है कि उन पर नियंत्रण करना काफी मुश्किल है। आज बांग्लादेश के कई कट्टरपंथी जेहादी संगठन असम व पश्चिम बंगाल के कई मुस्लिम बहुल इलाकों को अलग करके बृहत्तर बांग्लादेश की मांग करने की तैयारी में जुटे हैं। जो खूनी खेल आईएसआई ने कश्मीर में खेला वही आज पूर्वोत्तर भारत में बांग्लादेश की मदद से दुहरा रही है। उल्फा इसका माध्यम बन रही है। पिछले एक दशक से असम की हालात बद से बदतर हो गए हैं। आज असम की मुस्लिम राजनीति में उफान आना कोई मामूली घटना नहीं है।

मुसलमानों की भलाई का नाटक करने वाली यहां असम की मुस्लिम पार्टियों में अधिकांशत: बांग्लादेशी हैं। पहले असम के शहरों में रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी वाले बिहारी मजदूर होते थे किंतु अब उनकी संख्या घटकर मात्र आधी से भी कम रह गई है। उनके ,द्वारा छोड़े गये कामा पर बांग्लादेशी घुसपैठी अपना कब्जा चुके हैं। ये घुसपैठिये ठीक तरह से असमी भी नहीं बोल पाते जिससे यह साफ जाहिर होता होता है कि ये बांग्लादेशी हैं।

दिन-प्रतिदिन भयावह होती असम की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कठोर निर्णय लेने की जरूरत है। केंद्र सरकार को अपनी तुष्टिकरण और वोट बैंक की नीति को छोड़कर देश हित में फैसला लेने से असम अन्य राज्यों की तरह शांत रह सकता है। वर्ना वो दिन दूर नहीं जब जम्मू-कश्मीर के तरह ही असम भी भारत के लिए ऐसा नासूर बन जायेगा, जिसका दर्द आने वाले कई सदियों तक हर भारतवासी को सहना पड़ेगा।

Saturday, June 2, 2007

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Friday, June 1, 2007

नक्सलियों ने पूरे देश में आतंक मचा रखा है। उनका सफाया होना चाहिए। मगर किसी निर्दोष को सजा नही मिलनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में सलवाजुडुम के नाम पर क्या हो रहा है। यह किसी से छिपी नही है। जरा एक पीड़ित मां के पत्र देखते हैं:

दंतेवाडा से दो माताओं के पत्र
माननीय महोदय जी मैं श्रीमति भीमे पति श्री छन्नू राम ग्राम दोरगुडा विकासखण्ड भैरमगढ जिला दक्षिण बस्तर दंतेवाडा छत्तीसगढ राज्य की एक आदिवासी महिला हूं । नक्सलियों के विरोध में शुरु हुये आंदोलन सलवा जुडुम से मेरे परिवार एवं इसके सदस्यों को काफी हानि पहुंची है । मेरे पुत्र श्री मूडा को सितम्बर 2006 में नक्सली समर्थक कहकर जान से मर डाला गया है एवं मेरे देवर श्री जग्गू एवं उनकी पुत्री फूलमती को जेल में डाल दिया गया है । मेरा पुत्र, देवर व उसकी पुत्री अपना घर छोडकर शिविर में नहीं जाना चाहते थे, इसलिये वे जब कभी भी सलवा जुडुम के सदस्यों को आते हुये देखते थे तो अपने घर से जंगल की ओर भाग जाते थे । एक दिन सितम्बर 2006 को सुरक्षाकर्मी, विशेष पुलिस अधिकारी एवं सलवा जुडुम के सदस्यों ने घर पर आकर उसे घेर लिया एवं उसे मार डाला एवं मेरे देवर व उनकी पुत्री को ले जाकर जेल में डाल दिया । महोदय जी, जब एक बूढी मां की आंखों के सामने उसके जवान पुत्र का कत्ल किसी के द्वारा किया जाता हो और वह खडी होकर देखने के सिवा कुछ नहीं कर सकती तो वह किस मनोदशा में होती है यह कोई मां ही बता सकती है । कानून व्यवस्था को बनाये रखने वालों के द्वारा ही कानून व्यवस्था का उल्लंघन हो रहा है और सरकार का उनको खुला समर्थन प्राप्त है । मेरे पुत्र के दो बच्चे हैं और बहू जवानी में ही विधवा हो चुकी है । हम पति पत्नी दोनो ही बूढे हो चुके हैं और हमारा भविष्य हमारे पुत्र पर टिका हुआ था । अब उसके न होने पर आगे हम अपना जीवन किस तरह चला पायेंगे ? महामहिम जी, मेरे परिवार के दो सदस्यों को न्याय दिलवाने एवं मेरे पुत्र के कत्ल में शामिल सलवा जुडुम के सदस्यों को सज़ा दिलवाने की कृपा करें । मुझे अंदेशा है कि इस प्रार्थना पत्र के देने के पश्चात मुझ पर या मेरे परिवार पर दबावकारी कार्य किये जा सकते हैं अथवा मेरा अपहरण या मुझे झूठे मुकदमें में फसाया जा सकता है । यदि मेरे या मेरे परिवार के साथ ऐसा कुछ होता है तो इसकी सारी ज़िम्मेदारी जिला प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन की होगी । धन्यवाद सहित प्रार्थी श्रीमति भीमे पति श्री छन्नू राम ग्राम दोरगुडा विकासखण्ड भैरमगढ जिला दक्षिण बस्तर दंतेवाडा छत्तीसगढ राज्यमहामहिम जी मैं श्रीमति सनकी पति श्री मंगूराम भोगामी ग्राम दोरगुडा विकासखण्ड भैरमगढ जिला दक्षिण बस्तर दंतेवाडा छत्तीसगढ राज्य की एक आदिवासी महिला हूं । मैं शासन द्वारा सलवा जुडुम के समर्थन में नियुक्त विशेष पुलिस अधिकारियों एवं अन्य सुरक्षाकर्मियों द्वारा अपने परिवार के सदस्यों के साथ किये गये अत्याचार से अत्यंत दुखी हूं । मेरा पुत्र जयराम भोगामी एवं पुत्रवधु रामो भोगामी सलवा जुडुम नामक आंदोलन के शुरु होने के बाद दोरगुडा छोडकर अपने पुराने गांव फरसपाल के कोटवार पारा के पुश्तैनी घर में रहने लगे थे क्योंकि सलवा जुडुम के सदस्यों द्वारा हमारे गांव के सभी लोगों को अपने साथ शामिल करने एवं उन्हे शिविर में ले जाने हेतु ज़ोर जबरदस्ती किया जा रहा था और हमें इसका अंजाम पता था कि अपना घर छोडकर शिविर में जाने से किस प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड सकता है । शिविर में न तो रहने की सही व्यवस्था थी और ने ही परिवार के भरण पोषण हेतु आय का कोई ज़रिया था । इसी बात को ध्यान में रखकर मैंने अपने पुत्र और पुत्रवधु से अपने पुश्तैनी गांव के मकान में जाकर रहते हुये वहां की खेती बाडी का कार्य करते रहने को कहा एवं स्वयं दोरगुडा में रहने का निर्णय लिया । दिनांक 24.11.06 को मैंने अपने पुत्र और पुत्रवधु को दोरगुडा बुलाया क्योंकि धान पक चुका था और मैंने उसे काट लिया था एवं उसे समेटकर रखने की आवश्यकता थी । मेरे बुलाने पर पुत्र एवं पुत्रवधु दोनों आये एवं कटे धान को व्यवस्थित रखने का कार्य प्रारम्भ किया । इसी बीच सलवा जुडुम के सदस्य, विशेष पुलिस अधिकारी और अन्य सुरक्षाकर्मी आये और उन्होंने मेरे बेटे को घेर लिया एवं उसे बांधकर मारने पीटने लगे और उन्होने उससे कहा की तू नक्सलियों से मिला हुआ है इसीलिये तू इतने दिन से नहीं दिख रहा था । इस पर उसने जवाब दिया कि मैं अपने पुश्तैनी गांव में था एवं वहां पर रहकर खेती बाडी का काम देख रहा था एवं एक दो दिन पश्चात मैं आप लोगों से मिलने शिविर में आने वाला था । परंतु उन लोगों ने उसकी एक बात नहीं मानी, उसके हाथ पीछे बांधकर डंडों और लात घूंसों से बहुत बहुत मारा । इस पर मेरी पुत्र वधु ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उसे भी खूब पीटा गया । इसके बाद वे सभी मेरे पुत्र को घसीटते हुये मिरतुर गांव के थाने में लेकर गये एवं वहां पर भी उसकी खूब पिटाई की गई । इस पिटाई से उसके अस्थि पंजर के टूटने की आशंका है एवं उसके शरीर के अंदरूनी भागों को काफी नुकसान पहुंचा है एवं लगभग 2 सप्ताह बीत जाने के बाद भी हिलने डुलने की स्थिति में नहीं है । उसे वर्तमान में थाने में ही बन्द करके रखा गया है । इसके अलावा मुझे भी पीटा गया, जिससे मेरे सीने एवं अस्थिपंजर में भयंकर दर्द हो रहा है । महामहिम जी, मेरे परिवार के सदस्यों को बेवजह प्रताडित किया गया है एवं मेरे पुत्र को थाने में बन्द करके रखा हुआ है । यह एक भयावह स्थिति है कि सलवा जुडुम नामक इस आंदोलन के चलते हम जैसे गरीब लोगों का साथ देने के लिये कोई नहीं है । मैं यह प्रार्थना पत्र आपके पास न्याय की आशा के साथ भेज रही हूं । कृपया मेरे परिवार के सदस्यों को न्याय दिलाने की कृपा करें । मुझे अंदेशा है कि इस प्रार्थना पत्र के देने के पश्चात मुझ पर या मेरे परिवार पर दबावकारी कार्य किये जा सकते हैं अथवा मेरा अपहरण या मुझे झूठे मुकदमें में फसाया जा सकता है । यदि मेरे या मेरे परिवार के साथ ऐसा कुछ होता है तो इसकी सारी ज़िम्मेदारी जिला प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन की होगी । धन्यवाद सहित श्रीमति सनकी पति श्री मंगूराम भोगामी ग्राम दोरगुडा विकासखण्ड भैरमगढ जिला दक्षिण बस्तर दंतेवाडा छत्तीसगढ राज्य( मूल पत्र की फोटोकॉपी छत्तीसगढ नेट के पास सुरक्षित)